देश में BJP का दबदबा और बढ़ गया है, जबकि विपक्ष और कमजोर। चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव परिणाम हैरान करने वाले रहे। खासकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के परिणाम ऐतिहासिक रहे, जिसका असर राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ सकता है।
एक और सितारा । काउंटिंग शुरू होने के पहले तक सभी की तवज्जो का केंद्र बंगाल था। एक तो इसकी वजह थी चुनाव के दौरान के घटनाक्रम और दूसरे BJP व TMC के बीच करीबी मुकाबले का अनुमान। लेकिन, तमिलनाडु में विजय की TVK ने जिस अंदाज में सियासी पारी शुरू की है, उसने सभी को चौंका दिया है। दक्षिण भारत में फिल्मी सितारों का सियासत में आना और चमकना नया नहीं, पर इस बात की उम्मीद बहुत कम लोगों को रही होगी कि दो साल पहले बनी पार्टी इस तरह का प्रदर्शन करेगी।
अलग राजनीति । विजय ने अपनी फिल्मी लोकप्रियता को चुनावी सफलता में बदलने के लिए राज्य की पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से अलग राह अपनाई। उनके वादे युवाओं पर केंद्रित रहे और गठबंधन के बजाय खुद पर भरोसा किया। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि DMK और AIADMK की द्रविड़ पॉलिटिक्स अब प्रासंगिक नहीं रही।
नई पहचान । इसी तरह का ऐतिहासिक बदलाव बंगाल ने भी देखा। 15 साल पहले ममता बनर्जी ने लेफ्ट के 34 साल के शासन को खत्म किया था। अब उनका जाना केवल परिवर्तन नहीं, बंगाल की राजनीति को नई पहचान मिलना है। यह इलेक्शन बंगाली अस्मिता के नाम पर लड़ा गया, जिसमें साबित करने की होड़ थी कि कौन ज्यादा स्थानीय है।
परंपरा की ओर । केरलम की बात करें तो वहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की जीत बदलाव से ज्यादा मतदाताओं का राजनीतिक परंपरा की ओर लौटना है। पिनाराई विजयन के नेतृत्व में लेफ्ट की लगातार दो जीत से पहले वहां सत्ता बदलने का रिवाज था।
BJP ताकतवर । बंगाल में जीत के साथ देश के 22 राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों में BJP-NDA का विस्तार हो चुका है। तमिलनाडु और केरलम में पार्टी को ज्यादा बेहतर नतीजों की उम्मीद रही होगी। हालांकि वोटिंग पर्सेंटेज के आखिरी आंकड़े आने के बाद ही पता चलेगा कि पार्टी ने पिछली बार से कितना सुधार किया है। केरलम में कांग्रेस भले सबसे आगे रही, लेकिन उसके सामने राष्ट्रीय राजनीति में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की बड़ी चुनौती है।




