शादियों, सगाइयों का सीजन आ गया है। गली में खेल रही लाडो से किसी ने पूछा, बेटा कल शाम को कहां गई थीं। लाडो ने पूरी अदा से जवाब दिया, ईशू भइया की वाइफ की शादी थी उसमें गए थे। असल में ईशू भइया की कल सगाई थी। इत्तेफाक से हम भी उसमें मेहमान थे। सगाई की रौनक या तो होने वाले दूल्हा-दुल्हन थे या फिर हुड़दंग मचाते बच्चे। बाकी तो पूरी पब्लिक फोन में घुसी हुई थी।
सगाई में सबसे मुश्किल काम है मेहमानों की लिस्ट बनाना। किसे सगाई में बुलाना है, किसे शादी में और किसे एटहोम में इसकी ग्रेडिंग करने में विश्वस्तरीय एजेंसियां लगाई जाती हैं। संयोग से हम स्क्रीनिंग टेस्ट पास कर गए थे और सगाई में शामिल हुए। घुसते ही कॉफी का स्टॉल लगा था, आधी पब्लिक उसमें उलझकर रह गई। कुछ चाट, डोसे और चाऊमीन के स्टॉल का शिकार हो गए। अंदर हॉल में 99 पर्सेंट वयस्क अपने-अपने फोन में घुसे थे, बस एक इंजीनियर साहब थे जो एक शख्स को पकड़कर उसे अपनी थ्योरी सुना रहे थे।
डीजे वाला सारे ताजृतरीन ब्लॉकबस्टर बजा रहा था, कुछ देवियां वहां अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन कर रही थीं। हमारे सपूत आधा ठुमक आते, बाकी समय खाली पड़े सोफे पर जिम्नास्टिक का प्रदर्शन करते। हमने पूछा, क्यों आज फोन नहीं देखना? बेटा जी ने, अपने दोस्त की शर्ट पर आइसक्रीम पोंछते हुए कहा, अगर खेलने को मिले तो हम फोन कभी न देखें। एक अंकल बोले, इस बार समर कैंप में इन्हें स्विमिंग सिखाने भेजिएगा। यहां इंजीनियर साहब कूद पड़े, अरे शहरों में क्या तैरना सिखाएंगे, तैरना तो हमें हमारे भाई साहब ने सिखाया था। हम गांव के तालाब पर भैंस को नहलाने जाते थे, लेकिन किनारे खड़े रहते थे। एक दिन भाई साहब ने हमें तालाब के बीच में फेंक दिया। अगर भैंस की पूंछ न पकड़ी होती तो हम डूब गए होते लेकिन उसी दिन हमें तैरना आ गया। इतने में गाना बजा- जिसको डांस नहीं करना वो जाके अपनी भैंस चराए... इंजीनियर साहब उधर चल दिए।




