ममता बनर्जी और एमके स्टालिन की हार I.N.D.I.A. ब्लॉक के लिए ऐसा आघात है, जिससे वह 2029 लोकसभा चुनावों तक शायद ही पूरी तरह से उबर पाए। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में वोटरों ने ऐतिहासिक बदलाव पर मुहर लगाई है। वहीं, केरलम ने लेफ्ट फ्रंट सरकार को विदाकर UDF की ताज सौंप दिया है। कांग्रेस इस जीत से भले ही खुश हो, लेकिन NDA की ताकत और भी बढ़ गई है। बंगाल में BJP को अभूतपूर्व जीत मिली। साथ ही वोटरों ने असम और पुडुचेरी में एंटी इनकंबेंसी को सिरे से नकार दिया। दोनों राज्यों में NDA की सरकारें हैं।
बंगाल में BJP । लेकिन इन चुनावों की सबसे बड़ी हेडलाइन है बंगाल में ममता सरकार की विदाई और तमिलनाडु में विजय की पार्टी TVK की जीत। पिछले दस सालों से बंगाल में हिंदुत्व कार्ड खेल रही BJP आखिर कामयाब हो गई। 15 साल से सत्ता में रहीं ममता ने SIR को लेकर राज्य के कई हिस्सों में उपजे गुस्से को हथियार बनाने की कोशिश की। उन्होंने लक्ष्मी भंडार और युवा साथी जैसी रेवड़ियां भी बांटीं। लेकिन हिंदुत्व के अलावा स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों को उछालकर BJP अपने 'पोरिबोर्तन' के स्लोगन को ऐसी खामोश आंधी में बदलने में कामयाब रही, जिसके ये नतीजे गवाही दे रहे हैं।
मुसलमान वोट छिटका । ममता को SIR की बदौलत उसके समर्थकों के वोटर लिस्ट से गायब होने का खासा नुकसान हुआ है। साथ ही, उससे कुछ हद तक मुसलमान वोट भी छिटका है। वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी के अनुसार 15 सालों में मुसलमानों की ममता से अपेक्षाएं बढ़ीं और समुदाय के कई लोगों को लगा कि राज्य सरकार की योजनाएं उनके लिए नाकाफी हैं।
तीसरी ताकत का उदय । तमिलनाडु में फिल्म स्टार विजय का इतनी बड़ी ताकत बनकर उभरना द्रविड़ राजनीति का एक ऐसा अध्याय है, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। करीब छह दशक में पहली बार तमिलनाडु की बागडोर DMK और AIDMK के अलावा किसी तीसरे दल के हाथों में गई है। विजय ईसाई हैं और इस समुदाय के राज्य में सिर्फ 6-7 प्रतिशत वोटर हैं। लेकिन उन्हें युवाओं के साथ सभी समुदायों और जातियों का अप्रत्याशित समर्थन मिला।
खरगे की चूक । कांग्रेस का एक धड़ा चुनाव से पहले DMK का साथ छोड़ विजय की TVK के साथ गठबंधन करना चाहता था। लेकिन मल्लिकार्जुन खरगे और पी चिदंबरम ने इन मंसूबों पर पानी फेर दिया। कांग्रेस के डेटा एनालिटिक्स विभाग के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती का मानना है कि पार्टी ने एक सुनहरा मौका गंवा दिया। उनके मुताबिक, ‘ऐसा मौका 50 साल में एक बार आता है। अगर हम विजय से समझौता कर लेते तो आंध्र प्रदेश छोड़कर दक्षिण के तमाम राज्यों में I.N.D.I.A. ब्लॉक की सरकारें होतीं।’ विजय कई बार कह चुके हैं कि विपरीत विचारधारा के कारण वह BJP से गठबंधन नहीं करेंगे। ऐसे में कांग्रेस का यह मलाल समझ में आता है।
केरलम स्टोरी । केरलम में UDF की वापसी की खास वजहों में एक लेफ्ट फ्रंट की अल्पसंख्यकों की ओर ढुलमुल नीति रही। ऊपर से विजयन ने पार्टी के काडर-केन्द्रित ढांचे को अपने इर्द-गिर्द समेट कर सीपीएम की इमेज को खासा नुकसान पहुंचाया। अल्पसंखयक बनाम बहुसंख्यक के मुद्दे के अलावा सबरीमला जैसे मुद्दों पर भी लेफ्ट फ्रंट की नीति गलत रही।
'मामा' का जादू । असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की सभाओं में महिलाओं की खासी भीड़ जुट रही थी। वजह साफ थी। उनकी सरकार की महिलाओं के लिए योजनाएं, जिनमें मुफ्त राशन और महिलाओं के खातों में 1,250 रुपये प्रति माह डालना शामिल है। राज्य में इस बार के चुनाव में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही। इसका श्रेय हिमंत को जाता है।
राष्ट्रीय राजनीति पर असर । राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में चुनावी स्कोर 3-2 बैठता है। लेकिन बंगाल में जीत और तमिलनाडु में विपक्ष के सत्ता से बाहर होने की वजह से NDA के लिए नतीजे कहीं ज्यादा अच्छे दिखते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में BJP एक देश, एक चुनाव, परिसीमन और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को और भी तेजी से उठाएगी।




