हर साल गर्मी, सर्दी और बरसात अपने निर्धारित समय पर आते हैं। प्रकृति अपनी लय में चलती रहती है, बिना रुके, बिना थके। लेकिन जैसे ही तेज गर्मी का दौर शुरू होता है, हमारे भीतर शिकायतों की हलचल भी शुरू हो जाती है। ऐसे में एक प्रश्न अनायास उठता है- यह शिकायत आखिर किससे है, किसे सुनानी है और उससे मिलेगा भी क्या?
शायद समस्या बाहर के मौसम में नहीं, हमारे भीतर की अपेक्षाओं में है। हमने जैसे यह मान लिया है कि ईश्वर की कृपा केवल सुखद परिस्थितियों में ही प्रकट होती है- जब हवा शीतल हो, बरसात की फुहारें मन को भिगो रही हों, और चारों ओर फूल खिले हों। लेकिन जैसे ही यह संतुलन टूटता है, हमारा मन भी अस्थिर हो जाता है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी मनःस्थिति को समझाते हुए कहा है, ‘शीतोष्णसुखदुःखेषु समः’, यानी जो व्यक्ति ठंड-गर्मी, सुख-दुःख में समान भाव रखता है, वही वास्तव में स्थिरचित्त है। यह समभाव कोई अचानक मिलने वाली अवस्था नहीं, निरंतर अभ्यास और जागरूकता से अर्जित होने वाली साधना है। जब बाहर का वातावरण कठोर हो जाए, तब भीतर की शांति को और अधिक गहरा करना चाहिए। जैसे गर्मी के दिनों में नदी ऊपर से सिकुड़ जाती है, लेकिन भीतर से और गहरी हो जाती है, वैसे ही यह मौसम हमें अपने भीतर उतरने का अवसर देता है। प्रकृति का हर मौसम एक गुरु की तरह हमारे सामने आता है। वह हमें सिखाने आता है कि परिवर्तन ही सत्य है।




