भारत की संघीय व्यवस्था कोमजबूत करने पर देना होगा ध्यान

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हालिया चुनावों में पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के नतीजों ने देश की संघीय व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन के बीच टकराव, केंद्रीय बलों की भारी तैनाती और धर्म-जाति के आधार पर प्रचार ने लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती दी है। इन घटनाओं से समाज में दरारें बढ़ने की आशंका है।

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चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में हुए चुनावों में BJP ने पश्चिम बंगाल और असम में, एक्टर विजय की पार्टी TVK ने तमिलनाडु में, केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाले अलायंस UDF ने जबकि पुडुचेरी में NDA ने जीत हासिल की है। लेकिन क्या ये चुनाव लोकतांत्रिक मूल्यों पर खरे उतरे? कहीं इन चुनावों के दौरान संघीय ढांचे को कोई नुकसान तो नहीं पहुंचा!

आयोग से टकराव । केंद्रीय चुनाव आयोग की जिम्मेदारी राज्यों के प्रशासन को साथ लेकर चलने की थी। मगर पश्चिम बंगाल में SIR से लेकर मतगणना तक राज्य प्रशासन और आयोग आमने-सामने दिखे। चुनाव से जुड़े हर कदम पर यही हुआ। इसका चरम था मतगणना में केंद्र सरकार के अधिकारियों को पर्यवेक्षक के रूप में भेजना।

क्या रही आशंका । ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीम कोर्ट के जरिए इसे रोक नहीं पाई, लेकिन उसने आम जनता व राज्य के कर्मचारिेयों के मन में यह आशंका तो डाल ही दी कि चुनाव आयोग उन पर भरोसा नहीं करता। हालांकि, केंद्रीय चुनाव आयोग ने यह निर्देश 13 अप्रैल 2026 को ही दे दिया था। TMC का कहना था कि उसे इसका पता मतदान के बाद चला।

जनता का जुड़ाव । फिर राज्य में रेकॉर्ड सुरक्षाबल की तैनाती में इस बार चुनाव हुए। पिछले चुनावों तक पश्चिम बंगाल में अधिकतम 900 कपंनियों की तैनाती हुई थी। यह संख्या इस बार 2,400 पहुंच गई। क्या केंद्रीय बलों की तैनाती से किसी राज्य का विश्वास जीता जा सकता है? उत्तर प्रदेश के एक सख्त माने जाने वाले पुलिस अधिकारी की पर्यवेक्षक के रूप में तैनाती के बाद भी दक्षिण 24 परगना जिले के फालटा विधानसभा क्षेत्र में फिर से मतदान कराना पड़ा। क्या इससे यह संदेश नहीं गया कि बाहर से की गई तैनाती निष्पक्ष चुनाव की गारंटी नहीं है। लोगों को चुनाव प्रक्रिया में बेहतर ढंग से शामिल करना ही सही उपाय है।

क्या कहता है संविधान । पश्चिम बंगाल में राजनीतिक स्तर पर भी संघवाद को भारी चोट पहुंची है। तृणमूल कांग्रेस ने BJP के हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का मुकाबला करने के लिए बंगाली अस्मिता का नारा दिया। दिलचस्प ये है कि बंगाली अस्मिता को सभी समुदायों को साथ लेकर चलने वाले विचार के रूप में पेश किया गया। यह भारतीय राष्ट्र का सैद्धांतिक आधार है। भारतीय संविधान किसी के साथ धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा के साथ भेद को अस्वीकार करता है। वहीं, BJP का घुसपैठियों को बाहर निकालने का नारा और ममता बनर्जी पर तुष्टीकरण का आरोप पार्टी की संकीर्णतावादी छवि ही बनाता है।

अाचार संहिता का उल्लंघन । आदर्श अाचार संहिता की धज्जियां उड़ाते हुए चुनाव में धर्म और जाति के नाम पर संदेश दिए गए और यह असम से लेकर केरल तक हुआ। अगर बंगाल में हिंदू बनाम मुसलमान का मुद्दा बनाने की कोशिश हुई तो तमिलनाडु में भाषा और संस्कृति का सवाल उठा। सनातन बनाम द्रविड़ और हिंदी बनाम तमिल का मुद्दा देश को कहां ले जाएगा, यह भविष्य ही बताएगा।

समाज में एका रहे । अभी जिन राज्यों में चुनाव हुए, उनमें पश्चिम बंगाल और असम भोगौलिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। दोनों ही राज्यों में BJP पहले से ज्यादा बड़ी शक्ति के रूप में उभरी है। इन राज्यों में समाज के बीच दरार नहीं बढ़नी चाहिए। असम पूर्वोत्तर की धुरी है और उसे भारतीय राष्ट्र के बेहतरीन मूल्यों का प्रतिनिधि बनकर उभरना चाहिए।

विजय की चुनौती । तमिलनाडु में अभिनेता विजय आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के अंदाज में सत्ता तक पहुंचे हैं। इस तरह की राजनीति में एक भावुकता होती है, जो शासन चलाने की सचाइयों से टकराने के बाद टूट-फूट जाती है। विजय ने खुद को धर्मनिरपेक्ष और विविधता में एकता पर यकीन करने वाले लीडर के रूप में पेश किया है। लेकिन भ्रष्टाचार का खात्मा और बेहतर गवर्नेंस के लिए AI के इस्तेमाल का उनका प्रस्तावित मॉडल कितना उपयोगी होगा? वहीं, केरल के परिवर्तन ने एक बार फिर साबित किया है कि लेफ्ट को प्रासंगिक बने रहने के लिए वैचारिक और व्यावहारिक मेहनत करनी होगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)