पश्चिम बंगाल में TMC का दबदबा ख़त्म

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पश्चिम बंगाल में अब कोई एक पार्टी हावी नहीं है। राजनीति एक नए प्रतिस्पर्धी दौर में आ गई है। ममता सरकार के शुरुआती वादों से दूरी और जनता के असंतोष को भाजपा ने भुनाया। सत्ता का केंद्रीकरण और तुष्टिकरण जैसे मुद्दे उठे। घुसपैठ और नागरिकता पर भाजपा का जोर चला। विकास के मुद्दे अब अहम हो गए हैं।

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पश्चिम बंगाल में साल 2016 में जब विधानसभा चुनाव हुए, तब BJP को केवल 3 सीटें मिली थीं और वोट शेयर भी इतना ही था, 3%। पांच साल बाद, 2021 के चुनाव में पार्टी ने 77 विधानसभा सीटें और 38% से अधिक वोट शेयर हासिल कर खुद को मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित कर दिया। और फिर पांच साल बाद इस विधानसभा चुनाव में BJP की जीत यह बताती है कि बंगाल की राजनीति अब एक पार्टी के दबदबे से बाहर निकलकर एक प्रतिस्पर्धी दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां मुकाबला ज्यादा खुला और दिलचस्प हो गया है।

ममता से दूरी

पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझने के लिए उसका इतिहास जानना जरूरी है। राज्य में करीब 34 साल तक वाम मोर्चा का शासन रहा, जिसे 2011 में ममता बनर्जी ने खत्म किया। उस समय उन्होंने सिंगूर और नंदीग्राम जैसे आंदोलनों के जरिए किसानों व आम लोगों की आवाज उठाई, खुद को बदलाव के चेहरे के रूप में स्थापित किया। लेकिन BJP के नजरिए से देखें, तो सत्ता में आने के बाद ममता सरकार अपने शुरुआती वादों से दूर जाती नजर आई। इससे जनता के एक हिस्से में असंतोष बढ़ा। BJP ने इस बढ़ते असंतोष को एक मौके के रूप में देखा और धीरे-धीरे राज्य में अपनी पकड़ मजबूत की।

BJP के नजरिए से पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ा मुद्दा 'सत्ता का केंद्रीकरण' और 'कथित तुष्टिकरण की राजनीति' रहा है। पार्टी लगातार यह आरोप लगाती रही है कि TMC सरकार ने कानून-व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया और राजनीतिक हिंसा को ठीक से नियंत्रित नहीं किया। इसके अलावा, शिक्षक भर्ती घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के आरोप भी BJP के चुनावी अभियान का अहम हिस्सा रहे।

मुस्लिम समर्थन

BJP ने घुसपैठ और नागरिकता के मुद्दे को जोरशोर से उठाया। पार्टी का कहना था कि अवैध प्रवास से स्थानीय लोगों की नौकरियों और संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। इस मुद्दे को स्थानीय बनाम बाहरी की बहस से जोड़ा गया। सीमावर्ती और उत्तर बंगाल में यह एक बड़ा मुद्दा रहा, जिससे BJP को फायदा हुआ। इसीलिए शुरुआती परिणाम से ऐसा लग रहा है कि मुस्लिम वोटों का भी एक हिस्सा पार्टी को मिला है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में पारंपरिक तौर पर रहे औद्योगीकरण के विरोध में इस बार बदलाव नजर आया है। इस चुनाव ने संकेत दिया कि अब विकास जैसे बुनियादी मुद्दे ज्यादा अहम होते जा रहे हैं और विभिन्न समुदायों का इसे समर्थन मिल रहा है। इससे यह अनुमान भी निकलता है कि अल्पसंख्यक समूहों के ध्रुवीकरण की राजनीति अब शायद खत्म होती नजर आए।

उम्मीदें और मुश्किलें

यह चुनाव नतीजे पश्चिम बंगाल की जनता, खासकर युवाओं की नई आकांक्षाओं को दिखाते हैं। आने वाली सरकार के लिए भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, हिंसा पर लगाम, औद्योगिक विकास और बेहतर स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था बड़ी चुनौतियां होंगी। इसके साथ ही पारंपरिक नौकरशाही को इन नए लक्ष्यों के अनुसार ढालना भी एक बड़ी परीक्षा है, जो अब तक केंद्र बनाम राज्य की राजनीति में उलझी रही है।

जहां तक चुनावी विवादों की बात है, तो स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR, चुनाव आयोग की भूमिका, EVM से छेड़छाड़ के आरोप जैसे मामले कुछ समय तक चर्चा में रह सकते हैं। लेकिन, एक बात साफ है कि बंगाल की जनता ने लोकतंत्र में अपना भरोसा मजबूत किया है। अब इस भरोसे पर खरा उतरने की जिम्मेदारी नई सरकार पर होगी।

(लेखक हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में प्रफेसर हैं)