भारत की सभ्यता का प्रतिबिंब सोमनाथ

नवभारतटाइम्स.कॉम

सोमनाथ मंदिर भारतीय सभ्यता का प्रतीक है। इसने कई आक्रमणों को झेला पर हर बार फिर से खड़ा हुआ। यह मंदिर राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र है। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 2026-27 के माध्यम से इसके ऐतिहासिक महत्व को याद किया जा रहा है। यह पर्व लोगों को अपनी जड़ों से जुड़ने का संदेश देता है।

somnath a living reflection of indian civilization and a symbol of national unity

न हन्यते हन्यमाने शरीरे (शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।)- भगवद्गीता 2.20

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का भाव और भारतीय सभ्यता की सनातन चेतना का सबसे जीवंत उदाहरण सोमनाथ मंदिर में दिखाई देता है। 12 ज्योतिर्लिंगों में पहले माने जाने वाले सोमनाथ मंदिर ने इतिहास में कई आक्रमण और विनाश झेले, लेकिन हर बार फिर से खड़ा हुआ। इसकी आरती, घंटियों और श्रद्धा की आवाज कभी नहीं रुकी।

भारतीय इतिहास के हजारों वर्षों में सनातन धर्म ने कई चुनौतियों का सामना किया। आक्रमणों और राजनीतिक परिवर्तनों में मंदिर, मठ व ज्ञान केंद्रों को नुकसान पहुंचा। फिर भी आध्यात्मिक परंपरा जीवित रही और खुद को पुनर्स्थापित करती रही। संस्थागत क्षति के बावजूद इसकी आत्मा समाप्त नहीं हुई।

विविधता का इतिहास

सोमनाथ का इतिहास केवल आक्रमण की कहानी नहीं। प्राचीन काल से ही प्रभास पाटन एक महान तीर्थभूमि रहा है जिसे शिव-पट्टन और प्रभास-तीर्थ जैसे नामों से जाना गया। यहां तीन पवित्र नदियों का संगम होता है और यहीं भगवान श्रीकृष्ण के देहत्याग के बाद उनका अंतिम संस्कार हुआ। निकट ही वैराग्य क्षेत्र और गोपी तालाब स्थित हैं, जहां से गोपी चंदन प्राप्त होता है। काठियावाड़ और गुजरात की प्राचीन धरोहरों पर आधारित कई ऐतिहासिक अभिलेखों और पुरातात्विक रिपोर्टों में भी इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। यह शैव और वैष्णव परंपराओं के अद्भुत संगम का केंद्र है और हमें याद दिलाता है कि भारतीय संस्कृति हमेशा से बहुलतावादी और समावेशी रही है। स्वतंत्र भारत में सोमनाथ के पुनर्जागरण का आधुनिक अध्याय 12 नवंबर 1947, दीपावली के दिन आरंभ हुआ, जब देश के प्रथम उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस पवित्र स्थल का दौरा किया। विभाजन की पीड़ा के बीच सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में प्राण-प्रतिष्ठा की गई।

आज जब हम ‘भारत@2047’ की ओर बढ़ रहे हैं, तब सोमनाथ से जुड़े ये सभ्यतागत मूल्य और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। सोमनाथ हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व केवल सामर्थ्य से नहीं, बल्कि स्मृति, विवेक और मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से निर्मित होता है। इसी दृष्टि से 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 2026-27' की परिकल्पना की गई। 8 से 11 जनवरी 2026 के बीच प्रारंभ हुए इस पर्व के माध्यम से दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पड़ावों को याद किया जा रहा है- 1026 में सोमनाथ पर हुए प्रथम दर्ज आक्रमण के एक हजार वर्ष और स्वतंत्रता के बाद 1951 में पुनर्निर्मित मंदिर के पुनः उद्घाटन के 75 वर्ष।

देशभर में उत्सव

आयोजन का उद्देश्य सोमनाथ को राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक स्मृति के प्रतीक के रूप में स्थापित करना है। 11 मई को आयोजित होने वाले प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रम तक देशभर में यात्राएं, सांस्कृतिक आयोजन, संवाद, शैक्षिक कार्यक्रम और विभिन्न ज्योतिर्लिंगों, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, जिलों और शिवालयों में समन्वित गतिविधियां आयोजित की जाएंगी।

जड़ों से जुड़ाव का संदेश

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व आधुनिक समाज को सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास है। यह याद दिलाता है कि सोमनाथ सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि मूल्यों, परंपराओं व जिम्मेदारियों का प्रतीक है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते रहे। इसीलिए, यह आज एक जीवंत तीर्थ है। सोमनाथ की यह विरासत हमें निरंतर प्रेरित करती रहे उद्देश्यपूर्ण निर्माण करने के लिए, संतुलित आचरण के लिए और अपनी पहचान के प्रति सजग रहते हुए आगे बढ़ने के लिए।

(लेखक केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री हैं)

रेकमेंडेड खबरें