आज़ादी के जश्न के गवाह हैं जिमखाना क्लब के पेड़

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दिल्ली जिमखाना क्लब के पुराने पेड़ इतिहास के मूक गवाह हैं। इन्होंने आजादी का जश्न देखा है। ब्रिटिश काल से लेकर आज तक की हर घटना इन पेड़ों ने देखी है। ये पेड़ क्लब की पहचान हैं। सरकार ने अब क्लब पर नियंत्रण का फैसला किया है।

delhi gymkhana club trees silent witnesses to independence celebrations and history

अशोक, नीम और पीपल के सैकड़ों बुजुर्ग पेड़ साक्षी हैं दिल्ली जिमखाना क्लब के सौ साल से भी अधिक लंबे सफर के। इन छायादार पेड़ों ने ब्रिटिश साम्राज्य के पतन, आजादी की खुशियां, राजनीतिक साजिशें, टेनिस कोर्ट पर हंसी की गूंज और शाम की चाय की महफिलों को देखा है। अब सरकार इस क्लब पर नियंत्रण करने का फैसला कर चुकी है।

जब दिलीप आए । इन पेड़ों के चमकदार हरे पत्ते और लाल-नारंगी फूल क्लब की भव्य इमारतों के साथ मेल खाते हैं। अशोक वृक्ष भारतीय परंपरा में प्रेम, शुद्धता और शांति के प्रतीक हैं। इन पेड़ों के नीचे बैठकर याद किया जा सकता है 1966 में भारत-जर्मनी के बीच खेला गया डेविस कप मैच। इसे देखने के लिए सायरा बानो के साथ दिलीप कुमार भी आए थे।

विदाई पार्टी । ये पेड़ 6 अगस्त 1947 के उन भावुक क्षणों के भी गवाह हैं, जब बिग्रेडियर केएम करियप्पा ने देश के बंटवारे से ठीक पहले पाकिस्तान जा रहे भारतीय सेना के मुस्लिम अधिकारियों के लिए फेयरवेल पार्टी की मेजबानी की थी। करियप्पा आगे चलकर भारतीय सेनाध्यक्ष बने। लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लापिएर ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'Freedom at Midnight' में लिखा है कि यह फेयरवेल पार्टी जिमखाना क्लब के लॉन में आयोजित हुई थी और उसमें विदाई की पीड़ा स्पष्ट महसूस की जा सकती थी।

नीम और पीपल । नीम की कड़वाहट भरी पत्तियां दिल्ली की गर्म हवाओं में ठंडक बिखेरती हैं, जबकि पीपल की फड़फड़ाती पत्तियां पुरानी कहानियां सुनाती लगती हैं। ये पेड़ क्लब की मिट्टी में गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। ब्रिटिश काल में इनकी छाया में अफसर चाय पीते थे, स्वतंत्रता के बाद यहां भारतीय कुलीन वर्ग की नई पीढ़ी ने अपनी कहानियां बुननी शुरू कीं। इन पेड़ों का महत्व आज भी कम नहीं है।

जामुन के रंग । जिमखाना क्लब में एक कोने का नाम ही 'जामुन ट्री' है। मॉनसून में जामुन के गहरे बैंगनी फल गिरते हैं। जामुन की छाया घनी होती है, कुछ उसी तरह, जैसे क्लब का मेंबर बनने की दशकों लंबी वेटिंग लिस्ट। बरगद और सेमल भी यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। बरगद की लटकती जड़ें जैसे समय की लटें हैं, पुरानी यादों को सहेजे हुए। सेमल के लाल फूल फरवरी में खिलते हैं और पूरा परिसर रंगीन कर देते हैं।

प्रकृति के करीब । जिमखाना क्लब के पेड़ केवल छाया नहीं देते, दिल्ली की पारिस्थितिकी को संतुलित रखते हैं। इधर पक्षी चहचहाते हैं और गिलहरियां दौड़ती हैं। शाम के समय पेड़ों पर रहने वाले परिंदे इतनी तेजी से चहचहाते हैं, मानो अपने घरवालों को दिन भर की गतिविधियों की जानकारी दे रहे हों। इन्होंने भी इधर ब्रिटिश दौर की पार्टियों से लेकर आजादी के जश्न, आपातकाल की फुसफुसाहट से लेकर आज के आधुनिक नेटवर्किंग के दौर को करीब से देखा है। स्मृतियों के संरक्षक । दिल्ली जिमखाना क्लब के ये पेड़ स्मृतियों के संरक्षक हैं। अशोक की भव्यता, नीम की खट्ठी-मीठी यादें, पीपल की आध्यात्मिक शांति, जामुन की मिठास और बरगद की स्थिरता। इनके नीचे बैठो तो लगता है जैसे पूरा इतिहास जीवंत हो उठा हो।

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