सालाना जलसा

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गर्मी के मौसम में बिजली कटौती और पानी की समस्या आम हो गई है। लोग गर्मी से परेशान हैं और बिजली की समस्या से जूझ रहे हैं। यह समस्या हर साल गर्मियों में देखने को मिलती है। अधिकारी और नेता इस पर सालाना जलसे करते हैं। लोग प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहने की सलाह दे रहे हैं।

summer power cuts and annual gathering a satirical analysis

' गर्मी बहुत हो रही भाई साब।' इन दिनों बात शुरू करने की जो रस्म है, वही निभाते हुए श्रीमान क ने शुरुआत की। पार्क में शाम का वक़्त। थोड़ी देर पहले उठाए गए जाम की तरावट। इसी पिनक में मैने श्रीमान क को सुबह शाम एक एक लार्ज पैग लेने की सलाह दे डाली।

इससे पहले कि उनके चेहरे पर मुझे अधम समझने का भाव उभरे, मैंने मामला क्लियर कर दिया। 'सत्तू, प्याज, पुदीना, नींबू, नमक और पानी का लार्ज पैग। आपने क्या समझ लिया?' बहरहाल उनने स्पार्क करती हुई वायरिंग की तरह चमक कर कहा, 'दिन में दस दस बार बिजली कट रही है, कभी यहां फॉल्ट, कभी वहां।' मुझे गिलास आधा भरा हुआ देखने का कालजयी ज्ञान याद आ गया। मैंने कहा, 'जा नहीं रही बिजली। ये देखिए कि दस दस बार आ रही है। पॉजिटिविटी जरूरी है जीवन में।'

श्रीमान क भड़क गए, जैसे आजकल बिजली के ट्रांसफार्मर भड़क रहे हैं। उनने कहा, 'शहर तो शहर, अब गांवों भी लोग कूलर, एसी बहुत चलाने लगे हैं। आदत खराब हो रही है। इसी से तार फुंक रहे हैं।' श्रीमान क ने आदत का सवाल उठा दिया। वह भूल गए कि एक के बाद तमाम सरकारों ने बिजली बनाने के इतने कारखाने लगा दिये हैं कि तारों में बिजली ठसाठस हो गई है। जाम हटे तो बिजली आए।

फिर भी सलाह देने की अपनी आदत ठहरी। 'बिजली तो प्राकृतिक चीज है नहीं। प्रकृति के साथ रहना अच्छा होता है। सबने एक एक पेड़ लगाकर कॉलोनी को हरा भरा कर ही दिया है। जब गर्मी लगे, छांव में आ जाइए।' श्रीमान क के चेहरे पर अब गुस्से के साथ लाचारी भी दिखने लगी थी। मैंने कहा, 'मौसम का आनंद लेना सीखिए। कुछ महीने पहले ठंड का मौसम था। स्मॉग और पराली पर सालाना मुशायरा अपने शबाब पर पहुंचा। गर्मी का मौसम आया है, तो अब पानी और बिजली के वार्षिक कवि सम्मेलन में अधिकारियों और नेताओं के कविता पाठ का आनन्द लीजिए।'

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