अपनी पहली विदेश यात्रा (अमेरिका और यूरोप) के करीब सात बरस बाद 19 फरवरी 1897 में स्वामी विवेकानंद कोलकाता पहुंचे। सबसे पहले उन्होंने शारदा मां के दर्शन किए। मां को देखते ही स्वामीजी साष्टांग दंडवत हो गए। मां ने स्नेह से कहा, 'ठाकुर हर समय तुम्हारे साथ हैं। तुम्हें अभी संसार के कल्याण के लिए बहुत काम करना है।' स्वामीजी ने विनम्रता से कहा, 'मां, मैं ठाकुर का संदेश दुनिया तक पहुंचाना चाहता हूं और इसके लिए एक स्थायी संस्था बनाना चाहता हूं, लेकिन काम जल्दी पूरा नहीं हो पा रहा, इसलिए मन निराश हो जाता है।' मां मुस्कराईं और बोलीं, 'चिंता मत करो। तुम जो कर रहे हो, वह युगों तक रहेगा। इसी कार्य के लिए तुम्हारा जन्म हुआ है।' मां के इन शब्दों ने स्वामीजी के मन में नई ऊर्जा भर दी। कुछ ही दिनों बाद 1 मई, 1897 को उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो आज भी मानव सेवा और आध्यात्मिक जागरण का महान केंद्र है। स्वामीजी के जीवन से जुड़ी यह घटना हमें सिखाती है कि सच्चे मार्गदर्शक के आशीर्वाद और विश्वास से निराश मन भी नई ऊर्जा से भर उठता है। और जब उद्देश्य मानव कल्याण हो, तो संघर्ष भी इतिहास बन जाता है।



