कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता में है और वहां इस वक्त जो हो रहा है, वह उसकी बदली हुई रणनीति का संकेत है। पार्टी अब जिस राजनीतिक मॉडल पर काम कर रही है, उसमें जहां कांग्रेस संगठन मजबूत है, वहां वह सीधा मुकाबला करेगी। लेकिन जहां स्थिति कमजोर है, वहां वह गठबंधन और क्षेत्रीय दलों की मदद लेगी। साथ ही, वह क्षेत्रीय नेतृत्व को भी मजबूत करेगी।
गुटबाजी की समस्या । इसी वजह से कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद में बदलाव की एक बार फिर से चर्चा चल रही है। राज्य में 2028 में विधानसभा चुनाव होने हैं। जहां उसका मुकाबला BJP और JDS गठबंधन से होगा। राज्य में कांग्रेस गुटबाजी का शिकार रही है और वह नहीं चाहती कि इस वजह से कर्नाटक की सत्ता उसके हाथ से निकल जाए।
सीएम पद की लड़ाई । मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच खींचतान पुरानी है। यह मामला कई बार दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचा भी, मगर इसका हल अभी तक नहीं निकला है। जहां मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अनुभवी नेता हैं, वहीं डीके शिवकुमार को संगठन और चुनावी प्रबंधन में मजबूत माना जाता है। उन्हें शीर्ष नेतृत्व का भी करीबी बताया जाता है। दोनों के बीच पहले ‘ढाई-ढाई साल’ वाले कथित पावर-शेयरिंग फॉर्म्युले को लेकर चर्चा भी चलती है। मगर तीन साल बाद भी राज्य में मुख्यमंत्री नहीं बदला।
भ्रम की स्थिति । दोनों नेताओं की दिल्ली में हुईं बैठकों से नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को बल मिला। अब कर्नाटक कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री आरवी देशपांडे ने बताया है कि अगले 24 घंटे में सिद्धारमैया इस्तीफा दे सकते हैं। विधायक चाहते थे कि वह अपने पद पर बने रहें, लेकिन मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने शीर्ष नेतृत्व से वादा किया है। अगले मुख्यमंत्री के बारे में अब वही फैसला लेगा। हालांकि, रणदीप सुरजेवाला ने बुधवार शाम कहा कि मुख्यमंत्री बदलने को लेकर कोई फैसला नहीं हुआ है।
BJP की राह पर । कांग्रेस पिछले वर्षों में कई राज्यों में चुनाव हार चुकी है। इससे उसका आत्मविश्वास कमजोर हुआ है। पार्टी की चुनावी रणनीति बेअसर रही है। ऐसे में लगता है कि वह BJP के रास्ते पर चलने जा रही है। BJP देश में विस्तार के लिए कई तरीकों पर काम करती है। मसलन, जहां वह मजबूत है, वहां अकेले सरकार बनाना, कमजोर राज्यों में गठबंधन करना और फिर उस राज्य में पार्टी को मजबूत करके छोटे भाई से बड़े भाई की भूमिका में आना। जहां पार्टी मजबूत नहीं है, वहां विपक्ष के कद्दावर नेता को BJP में शामिल करवाना और फिर उसे आगे करके चुनाव लड़ना। असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार में यही देखा गया और हिमंता बिस्वा सरमा, शुभेंदु अधिकारी और सम्राट चौधरी जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया गया। फिर बीच-बीच में नेतृत्व को बदलना ताकि हर कार्यकर्ता और नेता को मौका मिल सके और पार्टी को फायदा हो। अब कांग्रेस भी उसी पथ पर चलने की कोशिश कर रही है।
स्थानीय नेतृत्व बढ़ाना । तमिलनाडु में कांग्रेस का मुख्य गठबंधन लंबे वक्त से DMK के साथ था, लेकिन अब वह TVK के साथ है। केरल में पार्टी ने संगठन और मतदाताओं की चाहत को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री चुना। यानी कांग्रेस अब दिल्ली से फैसले थोपने के बजाय स्थानीय समीकरण साधने वाले लोकप्रिय नेताओं को तरजीह दे रही है। फिलहाल कांग्रेस की चार राज्यों में सरकारें हैं, जबकि झारखंड, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर में वह सत्तारूढ़ अलायंस में शामिल है। इसके अलावा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम में उसका विभिन्न पार्टियों से गठबंधन है, जहां वह क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटी है।
आगामी चुनावों पर नजर । मंडल कमीशन का विरोध करने वाली और जाति जनगणना पर लंबे समय तक अनिर्णय में रही कांग्रेस अब ओबीसी, दलित, आदिवासी और क्षेत्रीय पहचान को जोड़कर नया सामाजिक समीकरण गढ़ने की कोशिश कर रही है। ‘जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी भागीदारी’ का नारा देकर वह BJP के हिंदुत्व कार्ड को चुनौती देना चाहती है, जैसा 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के अलावा कुछ राज्यों में देखने को मिला भी था। कांग्रेस अब BJP की सफल रणनीतियों को अपनाते हुए गारंटी योजनाओं और ‘रेवड़ी राजनीति’ पर जोर दे रही है। चुनावी माइक्रो-मैनेजमेंट, स्थानीय चेहरों और भावनात्मक-सामाजिक मसलों के जरिए लड़ने की कोशिश कर रही है। लेकिन क्या उसकी यह रणनीति पिछली राजनीतिक चालों से बेहतर साबित होगी, इसका जवाब वक्त ही देगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)



