बंदर और लोकतंत्र

नवभारतटाइम्स.कॉम•
monkey menace and satire on democracy when uncle complained he got a unique response
हमारी कॉलोनी में बंदर बहुत आते हैं। ज्यादा उत्पात नहीं करते, बस गमले से पौधे निकालकर बाहर रख जाते हैं। कहते हैं, 'तुमने हमारे पेड़ काट दिए, हम तुम्हारे उगने नहीं देंगे।' एक अंकल को अपने पौधों से इतना प्यार है कि उन्होंने अपने पूरे घर को ही लोहे की जाली से ढक दिया। अब उनका घर पिंजरे जैसा लगता है। कैद बंदरों को करना था, कैद वे हो गए। अब बंदर अपने बच्चों को साथ लाकर दिखाते हैं, 'देखो, पिंजरे में बंद इंसान।'

एक रोज बंदरों ने अंकल को घेर लिया और दूध-ब्रेड लेकर भाग गए। गुस्साए अंकल पुलिस स्टेशन पहुंचे। इंस्पेक्टर से बोले, 'बंदरों को डिटेन कीजिए और कहीं दूर छोड़ कर आइए। बहुत परेशान कर रखा है।' इंस्पेक्टर बोले, 'परेशान तो हमें भी कर रखा है, पर हम इंसानों के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं, बंदरों के खिलाफ नहीं। उनके खिलाफ कार्रवाई वन विभाग करेगा।' अंकल वन विभाग पहुंचे। वहां जवाब मिला, 'हम बंदरों को डिटेन नहीं कर सकते। उन पर बीएनएस की धारा-163 लागू नहीं होती। वे झुंड में कहीं भी आ-जा सकते हैं।' अंकल गुस्सा कर बोले, 'इन बंदरों से देश की सुरक्षा को खतरा है। ये लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलना चाहते हैं।' 'फिर तो आप पुलिस के पास जाइए।' अंकल फिर थाने पहुंचे और इंस्पेक्टर से बताया कि बंदरों से देश की सुरक्षा को खतरा है, क्योंकि ये बहुत सारी संख्या में आते हैं। इंस्पेक्टर ने अंकल से पूछा, 'आजकल टीवी ज्यादा देख रहे हैं क्या? डिबेट देखना बंद कर दीजिए। देश पर आया खतरा टल जाएगा।' अंकल घर लौटे। बंदरों ने उनका इंटरनेट वाला तार नोच दिया था। अंकल न टीवी देख पाए, न ज्यादा मोबाइल। वह शांत हो गए। लोकतंत्र के खतरे में होने की आशंका भी जाती रही। हालांकि बंदर अब भी धमाचौकड़ी कर रहे थे।

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