The Dark Truth Of The Digital Economy The Heavy Burden Of Hyperscale Data Centers On Environment And Society
डिजिटल इकॉनमी का दूसरा चेहरा
नवभारतटाइम्स.कॉम•
मृत्युंजय राय
डिजिटल दुनिया में यह तो पता चलता है कि इससे आपके काम फटाफट हो रहे हैं। आपकी जिंदगी बहुत आसान हुई है। लेकिन इसके पीछे का तंत्र कैसा है, इसका अंदाजा नहीं लगता। जैसे, आप UPI से पेमेंट करते हैं तो कुछ लम्हों में लेनदेन पूरा हो जाता है, लेकिन परदे के पीछे यह व्यवस्था कैसे काम करती है, इसके बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और स्ट्रीमिंग प्लैटफॉर्म्स के साथ भी ऐसा है। AI चैटबॉट आपके सवालों का जवाब कुछ सेकंड में देता है, स्ट्रीमिंग प्लैटफॉर्म भी आपके क्लिक करते ही पसंदीदा फिल्म या वेब सीरीज दिखाना शुरू कर देते हैं।पैरिस मार्क्स की किताब ‘Hyperscale’ में इस दुनिया से जुड़ी जो पहेलियां हैं, उन्हें दूर किया गया है। वह लिखते हैं कि डिजिटल दुनिया का एक फिजिकल आयाम भी है। एक यूजर को जो भी ऑनलाइन एक्सपीरिएंस मिल रहा है, उसके लिए एक विशाल फिजिकल सिस्टम है। इस सिस्टम में इमारतें हैं, सेमीकंडक्टर चिप्स हैं, पावर इंफ्रास्ट्रक्चर है, कूलिंग इक्विपमेंट हैं, मिनरल्स और पानी का बेशुमार इस्तेमाल भी हो रहा है। किताब में बताया गया है कि किस तरह से हाइपरस्केल डेटा सेंटरों का विस्तार इंसानों, बाजार और धरती को बदल रहा है।
पैरिस मार्क्स एक जर्नलिस्ट और ‘Tech Won’t Save Us’ के होस्ट हैं। उन्होंने किताब में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के इन्फ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड कंप्यूटिंग, क्रिप्टोकरंसी और डिजिटल सेवाओं पर फोकस किया है। वह लिखते हैं कि AI का खतरनाक पहलू ऑटोनोमस या सुपर-इंटेलिजेंट सॉफ्टवेयर ही नहीं, बेइंतहा बिजली की खपत करने वाले डेटा सेंटर भी हैं। ये डिजिटल इकॉनमी की बुनियाद हैं।
पैरिस मार्क्स ने इस किताब में टेक्नॉलजिकल ट्रेंड्स को इस तरह से पेश किया है कि उसे आम लोग समझ सकें। उन्होंने हाइपरस्केल शब्द का इस्तेमाल उन विशालकाय डेटा सेंटरों के लिए किया है, जो बहुत ही बड़ी संख्या में इन्फॉर्मेशन प्रोसेस कर सकें। इन्हें लेकर टेक्नॉलजी की दुनिया के दिग्गज क्या कर रहे हैं, उसकी झलक भी किताब में मिलती है। इसमें बताया गया है कि मार्क जकरबर्ग के मेटा ने अमेरिका के लुजियाना में डेटा सेंटर के लिए 2,700 फुटबॉल के मैदान के बराबर जमीन खरीदी है। वहीं, स्पेसएक्स के संस्थापक इलॉन मस्क ने मेम्फिस में 7,85,000 वर्ग फुट का वेयरहाउस लिया है। यह प्रॉपर्टी मस्क ने डिजिटल प्रोसेसर के लिए ली है।
किताब में मार्क्स ने सिर्फ इनसे होने वाले कार्बन एमिशन की बात ही नहीं की है, वह यह भी बताते हैं कि ऐसी परियोजनाएं पावर ग्रिड और पानी के तंत्र को किस तरह से प्रभावित करते हैं। साथ ही, इनका संबंधित इलाके में प्रॉपर्टी के दाम पर किस तरह का असर पड़ता है। यह बात सही है कि ऐसी परियोजनाएं लगाते वक्त स्थानीय लोगों से रोजगार और निवेश को लेकर कुछ वादे किए जाते हैं, जिसमें कुछ सचाई भी होती है। लेकिन, ऐसी विशाल परियोजनाओं की वजह से वहां लंबी अवधि में पर्यावरण को नुकसान भी होता है।
इस किताब में पैरिस ने खासतौर पर डेटा सेंटर डिवेलपमेंट की पॉलिटिकल इकॉनमी की ओर भी ध्यान दिलाया है। इस सिलसिले में वह लिखते हैं कि जहां कंपनियों को ऐसे निवेश पर अक्सर टैक्स रियायतें मिलती हैं, वहीं परियोजनाओं से संबंधित कई बातें लोगों से छिपाई जाती हैं। इन्हें छिपाने के लिए कंपनियां कई बार नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट्स का सहारा भी लेती हैं। इसलिए यह किताब सिर्फ पर्यावरण संबंधी चेतावनी नहीं देती, यह सत्ता और कॉरपोरेशंस की जवाबदेही की भी बात करती है।