पुलिस से हर भूमिका क्यों चाहिए

नवभारतटाइम्स.कॉम•
why is every role expected from the police the need for judicial system reform
अपराधी के मन में दंड और आम नागरिकों के मन में कानून को लेकर सम्मान की भावना - इन दो बातों को लेकर अक्सर बहस होती है। हाल में सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ की कुछ टिप्पणियों ने इसमें कुछ दिलचस्प आयाम जोड़ दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि अपराधियों के मन में कानून का डर पैदा होना चाहिए। अपराधियों को यह लगना चाहिए कि अब अगर कुछ करेंगे तो मारे जाएंगे। यह वाक्य अदालत द्वारा सुनवाई के दौरान अंग्रेजी में की गई टिप्पणियों का देश के एक प्रतिष्ठित हिंदी अखबार द्वारा किया गया अविकल अनुवाद है।

बात का अर्थ । कोर्ट ने कहा कि हो सकता है कुछ लोग संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के अधिकार की वकालत करेंगे, पर पुलिस को इससे प्रभावित नहीं होना चाहिए। मेरी समझ है कि यहां 'मारे जाएंगे' का कतई वह अर्थ नहीं है, जो किसी पुलिस एनकाउंटर का जिक्र होते ही हमारे मन मे उभरता है और न ही अदालत अनुच्छेद-21 की पवित्रता को कमतर करके आंकने का प्रयास कर रही है।
मुठभेड़ों का सच । कुछ सीमित मामलों को छोड़कर ज्यादातर पुलिस मुठभेड़ों को ध्यान से देखते ही समझ में आने लगता है कि जो बताया जा रहा है, तथ्य वे नहीं। यह भी कि मारे जाने का अर्थ जान से हाथ धोने से नहीं है। मेरा विश्वास है कि सबसे बड़ी अदालत विधि द्वारा स्थापित प्रक्रियाओं के अतिरिक्त अन्य उपायों से किसी नागरिक की जान लेने का समर्थन नहीं करेगी।

सजा जरूरी । लैटिन में अपराध और दंड को लेकर एक महत्वपूर्ण उक्ति है, जिसे किसी भी ऐसे समाज को हमेशा याद रखना चाहिए, जो अपराध को पूरी तरह से समाप्त करना या कम से कम नियंत्रण में रखना चाहता है। इस उक्ति के अनुसार, गंभीर दंड से अधिक निश्चित दंड अपराध रोकने में मदद करता है। किसी अपराध के लिए कानून की किताबों में सख्त प्रावधान हो पर उसे देने की प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल हो कि किसी अपराधी को दंडित करना लगभग असंभव-सा हो जाए तो उसका कोई मतलब नहीं है। इसके उलट उसके संवैधानिक अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए अपेक्षाकृत हल्का पर निश्चित दंड उसे अपराध करने से पहले सौ बार सोचने को मजबूर करेगा।

दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति । भारतीय अदालतों में किसी अपराधी को दंड दिलाना उत्तरोत्तर मुश्किल होता चला गया है। एक आम धारणा बन गई है कि जाति, धन या सामाजिक हैसियत से मजबूत दोषी को दंडित करा पाना लगभग असंभव है। अदालतों के जरिये अपराध रोकने में असमर्थ सरकारें शॉर्टकट की संस्कृति को प्रोत्साहित करती हैं। वे पुलिस से ही अपेक्षा करने लगती हैं कि वह विवेचना और अभियोजन के साथ-साथ जज और जल्लाद की भूमिका भी निभाने लगे। वह किसी को अपराधी घोषित करे और उसके हाथ-पैर तोड़ दे या अगर अपराध की श्रेणी गंभीर हो तो ‘एनकाउंटर’ कर दे।

सामाजिक स्वीकार्यता । दुख की बात है कि पुलिस की इस गैरकानूनी हरकत को सामाजिक स्वीकृति मिली हुई है। अक्सर ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं, जिनमें कोई पीड़ित खुलेआम मांग करता है कि जिस अपराधी ने उसके प्रियजन को मारा है, पुलिस उसका ‘एनकाउंटर’ कर दे।

सुधार चाहिए । पुलिस को न्यायाधीश की भूमिका देने वाली सामाजिक स्वीकृति उस असहायता से उपजती है, जिसमें मान लिया जाता है कि सामान्य न्यायिक तौर-तरीकों से किसी अपराधी को सजा नहीं दिलाई जा सकती। इसे बदलने के लिए बाबा आदम के जमाने की न्याय प्रणाली को सुधारने की जरूरत है।

सम्मान की भावना । हमारे पास विश्वस्तरीय सड़कें बनाने के लिए तो पैसा है पर विश्वस्तरीय अदालतों के लिए नहीं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की उपरोक्त टिप्पणी निराश करने वाली है। उसके निर्देशों से कम से कम स्थगनों की संख्या पर तो रोक लग ही सकती है, जो मुकदमों के फैसलों में देरी के सबसे बड़े कारण बने हुए हैं। दरअसल कानून से भय की जगह उसके प्रति नागरिकों के मन मे सम्मान की भावना ही किसी लोकतांत्रिक समाज की मूल चेतना होनी चाहिए।

(रिटायर्ड IPS अधिकारी और साहित्यकार)

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