Cjis Refusal Principle Of Separation Of Powers And Impartiality
इनकार ही सही
नवभारतटाइम्स.कॉम•
सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी है नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना। साथ में न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक मर्यादाओं को भी बनाए रखना। न्यायपालिका की निष्पक्षता केवल उसके फैसलों से नहीं, उसकी कार्यप्रणाली से भी तय होती है। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जन खरगे से व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात करने से चीफ जस्टिस सूर्यकांत के इनकार को इसी तरह से लिया जाना चाहिए।
संतुलन रहना चाहिए । CJI ने इनकार की जो वजहें बताई हैं, उसमें एक है शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत। संविधान में शक्तियों का बंटवारा इस तरह से किया गया है कि वह एक जगह केंद्रित न हो। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं और उनमें संतुलन रखा गया है। संविधान का संरक्षक होने के नाते सुप्रीम कोर्ट पर ही जिम्मेदारी है कि वह इस संतुलन को बिगड़ने न दे।असर की आशंका । इनकार का अगला कारण रहा कि चुनाव आयोग से जुड़े मामले इस समय सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इसमें एक केस मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से जुड़ा भी है। ऐसे में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि अगर CJI से अलग से मुलाकात करके अपनी बात रखते हैं, तो सवाल उठ सकता है कि इससे चल रहे मुकदमों के फैसलों पर असर पड़ेगा। किसी भी मामले में हर पक्ष को न्यायपालिका के सामने अपनी बात रखने का बराबर अवसर मिलना चाहिए।
मुद्दा गंभीर । हालांकि इससे वे सवाल हल्के नहीं पड़ जाते, जिन्हें कांग्रेस समेत विपक्ष के अन्य दलों और कॉकरोच जनता पार्टी ने उठाया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार कई गंभीर आरोपों के सीधे निशाने पर हैं। मुद्दा नागरिकों के अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा है। जब चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर संदेह जताया जा रहा है, तब और जरूरी है कि इस चिंता को सामने रखने और उसकी सुनवाई का तरीका पूरी तरह से संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप हो। CJI ने याचिका दायर करने का रास्ता देकर उसका भी रास्ता सुझा दिया। इससे अनावश्यक दखल और प्रभावित करने या होने की गुंजाइश खत्म हो जाती है। यह मामला जिस तरह से आगे बढ़ रहा है, इस तरह के और संवेदनशील मौके सामने आ सकते हैं।
जल्द सुनवाई । विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल कर दी है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का केस भी है। कानून के तहत इन पर जल्द सुनवाई होनी चाहिए। एक संवैधानिक संस्था पर भरोसा बहाल करने के लिए अब लोग दूसरी संवैधानिक संस्था की ओर देख रहे हैं।