Indias Response To Us Sanctions On Russia Indias Counter On Oil Purchase From Russia
भारत के पास अमेरिकी बैन का जवाब
नवभारतटाइम्स.कॉम•
रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका लगातार भारत को प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दे रहा है, दूसरी ओर वह खुद रूसी डीजल खरीदने की तैयारी कर रहा है। इसे अमेरिकी नीति में दोहरे मापदंड के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन, समझना जरूरी है कि अमेरिका प्रतिबंधों के जरिए रूस पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। मास्को से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव इसी रणनीति का हिस्सा है।
भारतीय विकल्प । हालांकि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इन प्रतिबंधों को कितना लागू करेंगे, यह अभी साफ नहीं है। भारत के पास भी अमेरिकी दबाव का जवाब देने के विकल्प हैं। वह रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। इसे रिफाइन करके डीजल बनाया जाता है, जिसका निर्यात अमेरिका को भी होता है। इसलिए प्रतिबंध लगाने का फैसला करते समय ट्रंप को भारत के इन विकल्पों पर भी विचार करना होगा।द्विपक्षीय रिश्ते महत्वपूर्ण । व्यापार और रूस से तेल खरीद को लेकर नई दिल्ली-वॉशिंगटन के बीच तनाव है। लेकिन, रणनीतिक स्तर पर दोनों के हित काफी हद तक एक जैसे हैं। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी संबंधों को बेहतर बनाने के लिए अच्छा काम कर रहे हैं। उन्हें ट्रंप का भरोसा हासिल है। भारत-अमेरिका के बीच कारोबार में अच्छा सहयोग है और सैन्य सहयोग भी लगातार बढ़ रहा है। इसलिए टैरिफ और प्रतिबंधों की चर्चा भले ज्यादा होती हो, लेकिन दोनों देशों के रिश्ते इससे कहीं व्यापक और मजबूत हैं।
ईरान युद्ध किस ओर । अमेरिका और ईरान के बीच 1979 से ही तनाव रहा है। फरवरी में युद्ध शुरू होने के बाद यह और बढ़ गया। मौजूदा टकराव के पीछे कई ऐसे मुद्दे हैं, जो दशकों से बने हुए हैं। हमास, हिजबुल्लाह और हूती जैसे संगठनों का ईरान समर्थन करता है। अब ट्रंप प्रशासन को फैसला करना है कि वह ईरान से खतरा खत्म करने के लिए सैन्य कार्रवाई बढ़ाएगा या समझौते के रास्ते पर चलेगा। तेहरान ने कई बार बातचीत की इच्छा जताई है, लेकिन हर बार उसका रुख एक जैसा नहीं रहा। इसलिए अभी कहना मुश्किल है कि युद्ध किस दिशा में जाएगा।
होर्मुज प्राथमिकता । युद्ध शुरू करते समय ट्रंप के कई लक्ष्य थे, लेकिन अब उनकी प्राथमिकताएं सीमित होती दिख रही हैं। ट्रंप कह चुके हैं कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम काफी पीछे हो गया है। लंबे समय में अमेरिका चाहता है कि इस कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी और नियंत्रण हो, लेकिन फिलहाल यह उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता नहीं। अभी उसका सबसे बड़ा लक्ष्य होर्मुज स्ट्रेट को खोलना है।
(स्टीफन ईरान परमाणु समझौते को लागू करने के लिए US के पूर्व मुख्य समन्वयक हैं, रुद्रनील घोष के साथ उनके इंटरव्यू पर आधारित)