कुल्लू के सरकारी स्कूल का काम सात साल से अधूरा, बच्चों की पढ़ाई पर असर
कुल्लू के सरकारी स्कूल का काम सात साल से अधूरा, बच्चों की पढ़ाई पर असर
NewsPoint•
शिमला, 24 अगस्त। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की खराहल घाटी में एक सरकारी हाई स्कूल की इमारत का निर्माण कार्य सात साल बाद भी अधूरा है। यह स्थिति बच्चों की पढ़ाई की ज़रूरतों को पूरा करने में राज्य सरकार की कार्यप्रणाली, ईमानदारी और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करती है। कुल्लू के चनसारी स्कूल की बिल्डिंग का काम 2019 से चल रहा है, लेकिन इतने सालों बाद भी यह अधूरा है। इससे न केवल स्कूल बनाने का खर्च बढ़ गया है, बल्कि बारिश और प्राकृतिक आपदाओं में बिल्डिंग को काफी नुकसान भी पहुंचा है। स्कूल में पढ़ने वाले 100 से ज़्यादा छात्र जगह की कमी से जूझ रहे हैं।
यह स्कूल तीन पंचायतों - बांदल, स्यूगी और चनसारी - के तीन गांवों के बच्चों को शिक्षा देता है। पुरानी बिल्डिंग के क्षतिग्रस्त होने के बाद, स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (एसएमसी) ने एक प्राइवेट बिल्डिंग में क्लासें चलाने का इंतज़ाम किया था, लेकिन अब वह एग्रीमेंट भी खत्म हो गया है। एसएमसी के प्रेसिडेंट देवेंद्र शर्मा ने बताया कि स्कूल बिल्डिंग बनाने का टेंडर लगभग 1.18 करोड़ रुपए में दिया गया था, फिर भी काम पूरा नहीं हुआ है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा, “अगर शिक्षा विभाग ने तुरंत कोई कदम नहीं उठाया, तो आने वाले समय में क्लास चलाना मुश्किल हो जाएगा।” उन्होंने प्रशासन से नई बिल्डिंग का काम जल्द पूरा करने की अपील की है।स्कूल मैनेजमेंट कमेटी और ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में इस मुद्दे पर कुल्लू के डिप्टी कमिश्नर (डीसी) से मुलाकात की। ग्रामीणों ने मांग की कि प्रशासन स्कूल बिल्डिंग का काम जल्द से जल्द पूरा करवाए। उन्होंने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में एक ही कमरे में दो या तीन क्लासें चल रही हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। माता-पिता और स्थानीय लोगों ने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि उन्होंने स्कूल बिल्डिंग को लेकर प्रशासन से कई बार गुहार लगाई है, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। उनका कहना है कि बच्चों को पढ़ाई में बहुत दिक्कतें आ रही हैं।
स्कूल टीचर भल चंद शास्त्री ने बताया कि पुरानी बिल्डिंग कई सालों से खराब हालत में है और नई बिल्डिंग का निर्माण भी लंबे समय से रुका हुआ है। हालांकि, उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार उनकी शिकायत पर ध्यान देगी और जल्द ही सुधार करेगी ताकि बच्चों को पढ़ाई के लिए ज़रूरी बुनियादी सुविधाएं मिल सकें।
यह मामला राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है। सात साल एक लंबा समय होता है, खासकर जब बच्चों की शिक्षा का सवाल हो। इतने सालों में न केवल प्रोजेक्ट की लागत बढ़ जाती है, बल्कि प्राकृतिक आपदाएं भी नुकसान पहुंचा सकती हैं, जैसा कि इस मामले में हुआ है। स्कूल बिल्डिंग का अधूरा रहना बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। जब बच्चे एक ही कमरे में बैठकर पढ़ाई करते हैं, तो उनकी एकाग्रता और सीखने की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। शिक्षकों के लिए भी यह एक चुनौती है कि वे कैसे अलग-अलग कक्षाओं के छात्रों को एक साथ पढ़ाएं।
एसएमसी के प्रेसिडेंट देवेंद्र शर्मा की चिंता जायज है। अगर जल्द ही कोई समाधान नहीं निकाला गया, तो बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह से बाधित हो सकती है। प्राइवेट बिल्डिंग का किराया देना भी एक अतिरिक्त बोझ हो सकता है, और अगर वह जगह भी हाथ से निकल जाए, तो स्थिति और भी गंभीर हो जाएगी।
ग्रामीणों का प्रशासन से बार-बार गुहार लगाना यह दर्शाता है कि वे इस समस्या से कितने परेशान हैं। उन्होंने अपनी बात डिप्टी कमिश्नर तक पहुंचाई है, जो एक सकारात्मक कदम है। उम्मीद है कि प्रशासन इस मामले की गंभीरता को समझेगा और जल्द से जल्द स्कूल बिल्डिंग का निर्माण कार्य पूरा करवाएगा। यह न केवल बच्चों के लिए, बल्कि पूरे समुदाय के लिए एक बड़ी राहत होगी।
यह घटना सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता पर भी प्रकाश डालती है। जब किसी प्रोजेक्ट में देरी होती है और लागत बढ़ती है, तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि इसके पीछे क्या कारण हैं और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में ऐसी देरी स्वीकार्य नहीं है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे प्रोजेक्ट समय पर पूरे हों और बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए आवश्यक सुविधाएं मिलें।