वायनाड भूस्खलन की दूसरी बरसी: 330 जानें गईं, पुनर्वास में लौट रही जिंदगी
वायनाड भूस्खलन की दूसरी बरसी: 330 जानें गईं, पुनर्वास में लौट रही जिंदगी
NewsPoint•
केरल के वायनाड में दो साल पहले 30 जुलाई 2024 को आए विनाशकारी भूस्खलन की दूसरी बरसी पर, प्रभावित लोग आज भी उस दर्द से उबरने की कोशिश कर रहे हैं। इस भयानक प्राकृतिक आपदा में चूरलमाला और मुंडक्कई के पहाड़ी गांव तबाह हो गए थे, जिसमें आधिकारिक तौर पर 330 लोगों की जान गई थी, जिनमें 32 लोग वे भी शामिल थे जिन्हें पहले लापता घोषित किया गया था और बाद में मृत मान लिया गया। कीचड़, पत्थरों और बाढ़ के पानी के सैलाब में कई बस्तियां बह गईं, सैकड़ों लोग बेघर हो गए और वायनाड का चेहरा हमेशा के लिए बदल गया। आज भी, काले बादल या तेज बारिश की आवाज सुनकर उन लोगों की रूह कांप जाती है जिन्होंने उस खौफनाक रात को जिया है।
गुरुवार को आपदा की दूसरी बरसी पर, बचे हुए लोग आपदा स्थल और नए बने पुनर्वास टाउनशिप में इकट्ठा हुए। उन्होंने प्रार्थना की, मोमबत्तियां जलाईं और उन प्रियजनों को याद किया जो कभी वापस नहीं लौटे। कई लोगों के लिए, वह दर्द आज भी ताजा है। कुछ लोगों को तो अपने परिवार के सदस्यों को आखिरी बार देखने का मौका भी नहीं मिला था। इन लोगों की जिंदगी अब धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है। सरकार द्वारा बनाए गए पुनर्वास टाउनशिप में अब बच्चों की हंसी गूंज रही है, जो दो साल पहले यहां नहीं थी। ऐसी ही एक कहानी है छोटी बच्ची रितु की, जिसका जन्म उसकी मां सिंधु के भूस्खलन से बाल-बाल बचने के बाद हुआ था। आज, परिवार का नया घर उस त्रासदी से मिली उम्मीद की निशानी बनकर खड़ा है। पूरे टाउनशिप में ऐसी ही कई कहानियां सामने आ रही हैं, जहां विस्थापित परिवार मुश्किल दौर से निकलकर अपनी जिंदगी को फिर से संवारने की कोशिश कर रहे हैं।वायनाड की सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी इस अवसर पर सोशल मीडिया के जरिए लोगों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में लिखा, “चूरालमाला और मुंडक्कई के लोगों को तबाह करने वाली उस त्रासदी को दो साल बीत चुके हैं। हम वायनाड के लोगों की बहादुरी और हिम्मत को सलाम करते हैं। जो लोग हमें छोड़कर चले गए, उनकी याद और सम्मान में हम बचे हुए लोगों की हर संभव मदद करना जारी रखेंगे। हम अपनी जिंदगी को फिर से बनाने की हिम्मत भरी लड़ाई में उनके साथ खड़े रहने का अपना संकल्प दोहराते हैं, क्योंकि वे अपने दिलों में अपनों को खोने का गहरा दुख लिए हुए हैं।”
यह भूस्खलन 30 जुलाई 2024 को हुआ था। इसने वायनाड के चूरलमाला और मुंडक्कई इलाकों में भारी तबाही मचाई थी। भूस्खलन इतना भयानक था कि इसने कई गांवों को पूरी तरह से तबाह कर दिया। कीचड़, पत्थर और बाढ़ के पानी का तेज बहाव अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को बहा ले गया। सैकड़ों घर मलबे में दब गए और हजारों लोग बेघर हो गए। इस आपदा ने वायनाड के भूगोल को भी बदल दिया।
दो साल बाद भी, उस भयानक रात की यादें लोगों के जेहन में ताजा हैं। कई लोगों ने अपने परिवार के सदस्यों को खो दिया और उन्हें अंतिम संस्कार का मौका भी नहीं मिला। आज भी, जब आसमान में काले बादल छाते हैं या तेज बारिश की आवाज आती है, तो उन लोगों की रूह कांप जाती है जिन्होंने उस खौफनाक मंजर को अपनी आंखों से देखा है। यह उनके लिए एक गहरा सदमा है जिसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे।
सरकार ने प्रभावित लोगों के लिए पुनर्वास टाउनशिप का निर्माण किया है। इन टाउनशिप में अब जीवन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। बच्चों की किलकारियां गूंज रही हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि जीवन आगे बढ़ रहा है। रितु जैसी नई जिंदगियां इस बात का प्रमाण हैं कि उम्मीद कभी खत्म नहीं होती। उसकी मां सिंधु ने भूस्खलन से मुश्किल से जान बचाई थी और आज उनका नया घर उस त्रासदी से मिली उम्मीद की किरण है।
यह घटना वायनाड के इतिहास में एक काला अध्याय है। इसने न केवल जान-माल का भारी नुकसान किया, बल्कि लोगों के दिलों पर भी गहरा घाव छोड़ा है। लेकिन, वायनाड के लोग अपनी हिम्मत और हौसले से इस मुश्किल दौर से उबरने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी बहादुरी और जज्बे को सलाम।