लंदन में संस्कृत अध्ययन हेतु अक्षर-पुरुषोत्तम संस्कृत पाठशाला का शुभारंभ

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Navbharat Times
लंदन में संस्कृत का नया अध्याय शुरू हुआ है। महंत स्वामी महाराज ने 13 अक्टूबर को बीएपीएस श्री स्वामिनारायण मंदिर में अक्षर-पुरुषोत्तम संस्कृत पाठशाला का उद्घाटन किया। इस मंदिर को आमतौर पर निअस्डेन टेम्पल के नाम से जाना जाता है। यह पाठशाला महंत स्वामी महाराज की एक इच्छा का फल है, जिसे उन्होंने 24 सितंबर को सत्संग दीक्षा सन्मान महोत्सव में व्यक्त किया था। उन्होंने कहा था कि लंदन प्रवास के दौरान संस्कृत विद्यालय शुरू किया जाए। उद्घाटन से पहले ही 350 युवा विद्यार्थी इस पाठशाला से जुड़ चुके थे।

महामहोपाध्याय भद्रेशदास स्वामी ने सभा को संबोधित करते हुए संस्कृत का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि संस्कृत-अध्ययन की परंपरा भगवान स्वामिनारायण से प्रेरित है। संतों को संस्कृत और शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया और उच्च शिक्षा के लिए कई संतों को काशी भेजा गया। 1961 में योगीजी महाराज ने मुंबई में अक्षर-पुरुषोत्तम संस्कृत पाठशाला की स्थापना की थी। फिर 1973 में प्रमुखस्वामी महाराज ने सारंगपुर में यज्ञपुरुष संस्कृत पाठशाला शुरू की। महंत स्वामी महाराज अब इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं और बच्चों एवं युवाओं को संस्कृत अध्ययन के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
इस संबंध में भद्रेशदास स्वामी ने उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्रों पर संस्कृत में पांच खंडों की एक टीका लिखी है। 2018 में वैंकूवर में आयोजित 17वें विश्व संस्कृत सम्मेलन में अक्षर-पुरुषोत्तम दर्शन को वेदांत परंपरा के अंतर्गत एक विशिष्ट दर्शन-परंपरा के रूप में मान्यता मिली थी। आधुनिक अनुसंधान में भी संस्कृत की प्रासंगिकता दिखाई देती है। जैसे कि पाणिनि की व्याकरण व्यवस्था की सटीकता का अध्ययन संगणकीय भाषा विज्ञान में होता है। इसमें संस्कृत ग्रंथों के भाषा-प्रसंस्करण के काम भी शामिल हैं। 2016 में न्यूरोइमेज में एक अध्ययन में वैदिक संस्कृत के पेशेवर पाठकों के मस्तिष्क में संरचनात्मक भिन्नताओं का जिक्र हुआ। इस अध्ययन ने बताया कि ये भिन्नताएँ वर्षों के गहन अभ्यास के कारण हुए हैं।

उद्घाटन समारोह में युवा विद्वानों ने संस्कृत में एक प्रस्तुति दी। उनके रोचक संवाद के दौरान महंत स्वामी महाराज की पेरिस और लंदन यात्रा का उल्लेख किया गया। उन्होंने नई पाठशाला के लिए कृतज्ञता भी व्यक्त की। समारोह में अक्षर-पुरुषोत्तम महाराज का पूजन हुआ, उद्घाटन-शिलालेख का पूजन किया गया, और महंत स्वामी महाराज ने मंगलदीप प्रज्वलित किया।

आशीर्वचन देते वक्त महंत स्वामी महाराज ने संस्कृत में बात करते हुए इस भाषा की तारीफ की और इसके अध्ययन के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा, "संस्कृत का ज्ञान आने वाली पीढ़ियों को अक्षर-पुरुषोत्तम महाराज की महानता समझने और अपनी आध्यात्मिक नींव को मजबूत करने में सहायक होगा।" यह नई पाठशाला भाषा, शिक्षा और आध्यात्मिक परंपरा को एक साथ जोड़ती है। इससे लंदन के बच्चों और युवाओं को संस्कृत सीखने का और इसके अमूल्य ज्ञान से जुड़ने का मौका मिलेगा।

इस पहल से उम्मीद की जाती है कि युवा पीढ़ी संस्कृत के प्रति जागरूक होगी और इसे अपने जीवन में अपनाएगी। इससे केवल भाषा का ज्ञान ही नहीं, बल्कि अपने धार्मिक और ऐतिहासिक सांस्कृतिक मूल्यों को भी जानने का अवसर मिलेगा।