क्रोनिक हेपेटाइटिस बी के लिए हिबसागो दवा की मंजूरी, मरीजों को एंटीवायरल उपचार से राहत

NewsPoint•
Navbharat Times
अमेरिका ने 21 अक्टूबर को क्रोनिक हेपेटाइटिस बी के इलाज के लिए एक नई दवा को मंजूरी दी है। यह दवा, जिसका नाम ‘हिबसागो’ (बेपिरोविरसेन) है, उन मरीजों के लिए है जो इस बीमारी से ग्रस्त हैं लेकिन जिनमें सिरोसिस नहीं है। नए इलाज से कुछ मरीज अपनी एंटीवायरल दवाएं लेना बंद कर सकते हैं, जिससे उन्हें लंबे समय तक दवा का सेवन नहीं करना पड़ेगा। अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने इस नई तकनीक को स्वीकृति दी है, जिससे यह एक महत्वपूर्ण प्रगति है।

‘हिबसागो’ जीएसके द्वारा विकसित की गई है। यह एक इंजेक्शन वाली दवा है, जो उन वयस्कों के लिए डिज़ाइन की गई है, जिन्होंने कम से कम छह महीनों तक एंटीवायरल थेरेपी ली है। इस दवा में एक खास तकनीक शामिल है, जो वायरस को अपनी संख्या बढ़ाने और प्रोटीन बनाने में बाधा डालती है। इस नई प्रक्रिया के चलते, कुछ मरीज बिना दवा के भी वायरस को काबू में रख सकते हैं।
FDA के ‘ऑफिस ऑफ इंफेक्शियस डिसीज’ की कार्यवाहक निदेशक वेंडी कार्टर ने कहा, “क्रोनिक हेपेटाइटिस बी से पीड़ित कई लोगों के लिए, वायरस को दबाए रखने के लिए सालों तक एंटीवायरल दवाएं लेनी पड़ती हैं।” उन्होंने आगे बताया, “हिबसागो इलाज का एक नया तरीका पेश करता है, जिससे कुछ मरीज क्रोनिक एचबीवी का पूरा इलाज खत्म होने के बाद भी वायरस को नियंत्रित रख सकते हैं। यह मंजूरी इस गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रगति है।”

FDA ने यह सुनिश्चित किया है कि यह दवा केवल उन वयस्कों के लिए उपयुक्त है जो सिरोसिस से मुक्त हैं और जिनके खून में हेपेटाइटिस बी वायरस का स्तर कम है। मरीजों की पहचान के लिए विशिष्ट डायग्नोस्टिक टेस्ट का उपयोग किया जाएगा। एक मरीज के खून में ‘हेपेटाइटिस बी सरफेस एंटीजन’ का स्तर 3,000 इंटरनेशनल यूनिट प्रति मिलीलीटर या उससे कम होना चाहिए।

इस दवा के प्रभाव की जाँच दो क्लिनिकल ट्रायल में की गई थी। इन ट्रायल्स में हिबसागो की तुलना एक आम ‘प्लेसबो’ से की गई। मरीजों को 24 सप्ताह तक इंजेक्शन दिए गए, साथ ही उन्हें अपनी पहले से चल रही एंटीवायरल दवाएं भी लेनी पड़ी। हिबसागो का आखिरी इंजेक्शन लेने के बाद भी, मरीजों को कम से कम 24 सप्ताह तक अपनी दवा जारी रखनी थी।

इन ट्रायल्स में, हिबसागो लेने वाले 24 प्रतिशत मरीज अपनी एंटीवायरल दवाएं बंद करने की शर्तें पूरी करने में सफल रहे, जबकि प्लेसबो समूह में ऐसा कोई नहीं था। हेपेटाइटिस बी का पूरा इलाज बंद करने के 24 हफ्तों बाद भी, ‘हिबसागो’ लेने वाले 19 प्रतिशत मरीजों में वायरस पर नियंत्रण बना रहा। उनके खून में हेपेटाइटिस बी सरफेस एंटीजन का पता नहीं चला। ये नतीजे यह दिखाते हैं कि कुछ मरीज बिना लगातार इलाज के भी वायरस को कुछ समय तक नियंत्रित रख सकते हैं, हालाँकि यह अन्य मरीजों के लिए नहीं हो सका।

हालांकि, FDA ने इस दवा के साथ सुरक्षा संबंधी कई गंभीर जोखिमों की चेतावनी दी है। इसमें लिवर की गंभीर प्रतिक्रियाएं और प्लेटलेट काउंट में कमी जैसी समस्याएँ शामिल हैं। ये समस्याएं जानलेवा ब्लीडिंग का खतरा बढ़ा सकती हैं। इसके अलावा, किडनी की कार्यक्षमता की कमी और दवा के गलत तरीके से दिए जाने से पैदा होने वाली जटिलताओं के बारे में भी चेतावनी दी गई है। इस इलाज को कराने वाले मरीजों को नियमित रूप से ब्लड टेस्ट कराने होंगे। इसके साथ ही, उन्हें डॉक्टरों की निगरानी में रहना होगा।

जिनके लिए सामरिक रूप से हिबसागो का इस्तेमाल किया जाएगा, उन्हें इसकी शुरुआत से पहले और उसके दौरान खास ध्यान रखना होगा। आम साइड इफेक्ट्स में इंजेक्शन वाली जगह पर प्रतिक्रिया, बुखार, थकान और सिरदर्द जैसे लक्षण दिख सकते हैं।

FDA ने ‘रोश’ द्वारा विकसित एक डायग्नोस्टिक टेस्ट को भी मंजूरी दी है। यह टेस्ट सही मरीजों की पहचान करने और इलाज की निगरानी में मदद करेगा। इसके साथ ही, FDA ने इस दवा को ‘फास्ट ट्रैक’, ‘ब्रेकथ्रू थेरेपी’ और ‘प्रायोरिटी रिव्यू’ का दर्जा भी दिया है। इसका मतलब यह है कि FDA के अनुसार, यह दवा एक महत्वपूर्ण मेडिकल जरूरत को पूरा करने की क्षमता रखती है।

हालांकि इस नए इलाज के अमेरिका के बाहर कब उपलब्ध होगा, इस बारे में अभी कोई जानकारी नहीं है। क्रोनिक हेपेटाइटिस बी एक लंबे समय तक चलने वाला वायरल संक्रमण है। यह लिवर को प्रभावित करता है और कई मरीजों को इस वायरस को दबाने के लिए लंबे समय तक एंटीवायरल थेरेपी की जरूरत होती है।

भारत और पूरे एशिया में हेपेटाइटिस बी एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। इस बीमारी को नियंत्रित करने के लिए रोकथाम, टीकाकरण, स्क्रीनिंग और इलाज तक पहुंच बहुत जरूरी है। यह नई दवा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।

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