बस्तर के जगदलपुर में दिसंबर 1984 के अंतिम सप्ताह में नवभारत टाइम्स के विशेष संवाददाता के रूप में जाना हुआ। वह अनुभव आज भी आंखों के सामने घूम रहा है। चुनाव के दौरान आदिवासी मतदाता 24 किलोमीटर पैदल आए थे, वह भी हाट बाजार से नमक खरीदने के लिए। किसी पार्टी के कार्यकर्ता या सरकारी कर्मचारी के कहने पर वोट डालने के लिए तैयार तो हो गए, पर वे न वोट समझते थे, न पार्टी और न नेता। मैंने रिपोर्ट में यह भी लिखा था कि उन दिनों सामान्य बाजार में केवल 75 पैसे में मिलने वाला नमक आदिवासियों को डेढ़ रुपये किलो के भाव से दिया जा रहा था। नमक वे काले चींटों की चटनी बनाने में इस्तेमाल करते थे।
आतंक से मुक्ति । फिर धीरे-धीरे बस्तर नक्सलियों के चंगुल में फंसता गया। पेड़, जंगल, जानवर बचाने के नाम पर विकास के रास्ते बंद करके आदिवासियों को अंधेरे में धकेल दिया गया। लगभग 40 साल बाद केवल बस्तर ही नहीं, देश के 12 राज्यों के लगभग 120 जिले नक्सल आतंक से मुक्त होते दिख रहे हैं।
बड़ी सफलता । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को संसद में कहा कि देश से अब नक्सल-माओवादी आतंक लगभग खत्म हो चुका है। यह केवल राजनीतिक वक्तव्य नहीं, मोदी सरकार द्वारा पिछले वर्षों के दौरान चलाए गए सुनियोजित अभियान और संकल्प का परिणाम है। विशेषकर जगदलपुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर और गढ़चिरौली जैसे इलाकों में जिस प्रकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया मजबूत हुई है, वह भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति की बड़ी सफलता है। सरकारी और सुरक्षा एजेंसियों का अनुमान है कि 2014–2024 के दौरान 2200-2500 नक्सली विभिन्न मुठभेड़ों में मारे गए और 10 हजार से अधिक ने सरेंडर किया। 12 हजार से ज्यादा गिरफ्तार हुए।
बौद्धिक जंग भी । नक्सल हिंसा की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई। इसके लीडर चारू मजूमदार और कानू सान्याल थे। शहरी नक्सलवाद 80 के दशक में शुरू हुआ तब नक्सलवाद ने शिक्षा के केंद्रों में अपनी जड़ें जमानी शुरू की और 2004 आते-आते अपनी गतिविधियों को बदलकर बौद्धिक स्तर पर जंग छेड़ी।
हिंसक विचारधारा । 2004 में सीपीआई (मार्क्सवादी-लेनिनवादी), पीपल्स वॉर ग्रुप (PWG) और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के विलय के साथ सीपीआई (माओवादी) का गठन हुआ। इसने भारत में लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित संसदीय स्वरूप को उखाड़ फेंकने के लिए एक हिंसक विचारधारा का समर्थन किया।
NGO की आड़ । इन संगठनों में अकादमिक और ऐसे कार्यकर्ता शामिल होते हैं, जो ज्यादातर NGO के अंतर्गत काम करते हैं और सीपीआई (माओवादी) की संरचना से व्यवस्थित रूप से जुड़े होते हैं। हालांकि कानून से बचने के लिए ये अलग पहचान बनाए रखते हैं। यह वही नक्सलवाद है, जिसने युवाओं की सोच को जिस तरह दूषित किया, उसका उदाहरण JNU, जाधवपुर और उस्मानिया विश्वविद्यालयों में देखने को मिला है।
खतरनाक षड्यंत्र । 'शहरी नक्सलवाद' का समर्थन करने वाले संगठन दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चंडीगढ़ समेत कई शहरों में सक्रिय हैं। इनमें वकील, लेखक, पत्रकार, मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं, जिनकी समय-समय पर गिरफ्तारियां भी हुई हैं। ये लोग नक्सलियों को कानूनी और बौद्धिक समर्थन देते हैं। इनका मुख्य अजेंडा शहरों में नक्सलवाद का गुणगान करना और लोगों को नक्सली विचारधारा से जोड़ना है। ये विकास कार्यों को रोकने और अर्थव्यवस्था में बाधा डालने का षड्यंत्र रचते हैं। शिक्षा व्यवस्था से छेड़छाड़ और हिंदू संस्कृति पर हमला भी इनके अजेंडे में है। सरकार को अब अर्बन नक्सल पर ज्यादा कड़ी नजर रखनी होगी।
हालात बदले । जिन इलाकों में कभी चुनावों का बहिष्कार होता था, वहां स्थिति बदल चुकी है। आदिवासी अब जमीन के मालिक और निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बन रहे हैं। सड़क, बिजली, मोबाइल टावर और स्कूल उनके गांवों तक पहुंच गए हैं। नक्सलवाद का पतन केवल राजनीतिक और सैन्य सफलता नहीं, यह लोकतंत्र, विकास और सामाजिक परिवर्तन की जीत है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

