n दीपाली श्रीवास्तव, गुड़गांव
समय से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं और कम वजन के साथ जन्मे बच्चों की आंखों की रोशनी पर खतरा मंडरा रहा है। रेटिनोपैथी ऑफ़ प्रीमैच्योरिटी (ROP) नाम की यह बीमारी नवजात की आंखों की रोशनी तक छीन सकती है और सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह बिना लक्षण के चुपचाप बढ़ती रहती है। विशेषज्ञों के अनुसार, जन्म के बाद के पहले 4 से 6 हफ्ते ROP की पहचान के लिए सबसे अहम होते हैं। यदि इस दौरान आंखों की स्क्रीनिंग नहीं कराई जाए तो बीमारी 2-3 महीने के भीतर गंभीर हो जाती है, जहां बच्चे के स्थायी अंधेपन का खतरा बन जाता है। गुड़गांव में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत 2025 में ROP की 21 सर्जरी की गई हैं। जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। डॉक्टरों के अनुसार सबसे ज्यादा खतरा उन बच्चों में होता है जो समय पर स्क्रीनिंग से छूट जाते हैं। ऐसे मामलों में जब तक बीमारी पकड़ में आती है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। डॉक्टरों के मुताबिक, यदि समय रहते ROP की पहचान हो जाए, तो लेजर या इंजेक्शन के जरिए इलाज कर आंखों की रोशनी बचाई जा सकती है। नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (NICU) में भर्ती प्रीमैच्योर बच्चों की आंखें बेहद संवेदनशील होती हैं। जन्म के समय कम वजन, अधूरी विकसित रेटिना और ऑक्सीजन थेरेपी जैसे कारणों से इन बच्चों में ROP का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यही वजह है कि हर प्रीमैच्योर शिशु की आंखों की जांच जरुरी मानी जाती है। चिंता की बात यह भी है कि अभिभावकों में इस बीमारी को लेकर जागरूकता की भारी कमी है। अधिकतर माता-पिता को यह तक पता नहीं होता कि जन्म के कुछ हफ्तों के भीतर आंखों की जांच जरूरी है। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद फॉलोअप न कराने की लापरवाही भारी पड़ जाती है।
विकसित नहीं हो पातीं आंखों की नसें : ROP एक गंभीर आंखों की बीमारी है, जो समय से पहले और कम वजन वाले नवजात शिशुओं में होती है। इस बीमारी में बच्चे की आंखों की नसें पूरी तरह विकसित नहीं हो पातीं, जिससे उसकी रोशनी जाने तक का खतरा हो सकता है। ROP के शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए माता-पिता को समय रहते इसका पता नहीं चलता और बीमारी बढ़ जाती है। ऐसे में अगर बच्चा समय से पहले पैदा हुआ है, तो जन्म के 3–4 हफ्तों के भीतर आंखों की जांच जरूर कराएं और नियमित फॉलोअप कराते रहें। क्योंकि एक छोटी सी जांच, आपके बच्चे की पूरी जिंदगी की रोशनी बचा सकती है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से शहर में बच्चों की अर्ली स्क्रीनिंग लगातार की जा रही है। जिन बच्चों में किसी प्रकार की समस्या पाई जाती है, उनका समय पर लेजर सर्जरी के माध्यम से उपचार किया जाता है, जिससे ब्लाइंडनेस का खतरा समाप्त किया जा सके । विभाग की कोशिश है कि इससे जुडी जागरूकता ज्यादा से ज्यादा लोगों में पंहुचा सके। अभिभावकों से अपील है कि वो ऐसे बच्चों का समय पर जांच जरूर कराएं।

