Dont Curse Circumstances Learn To Change Them With Action
हालात को कोसकर चुपचाप बैठ जाना अपनी पहली हार है
Contributed by: हरीश बड़थ्वाल|नवभारतटाइम्स.कॉम•
पिछले हफ्ते की बात है, घाटी में बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। नवनिर्मित मकान के आंगन में जल निकासी का पाइप लगाना जरूरी था। कारीगर ने भरोसा दिलाया कि वह बरसते पानी में ही पाइप लाएगा और फिट भी कर देगा। उसने अपना वादा निभाया और समय पर काम पूरा कर दिया।
इस छोटी-सी घटना ने सोचने को मजबूर किया- मनोयोग से कर्म करने वाला व्यक्ति परिस्थितियों का रोना नहीं रोता, उसकी निगाह मौसम और हालात पर नहीं, अपने लक्ष्य पर होती है। बारिश उसे रोकती नहीं, गर्मी उसे थकाती नहीं और सर्दी उसके संकल्प को डिगा नहीं पाती। इसके विपरीत, जो लोग आज बारिश को कोस रहे हैं, वही कल गर्मी और कुछ महीनों बाद शीतलहर की दुश्वारियों का विलाप करते मिलेंगे। उनके लिए प्रकृति तभी तक अच्छी है, जब तक वह उनकी सुविधा और अपेक्षाओं के अनुकूल बनी रहे। यहीं से प्रकृति के प्रति हमारे नजरिए का फर्क सामने आता है। एक दृष्टि प्रकृति को उपयोग की वस्तु मानती है, दूसरी उसे अपने अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा समझती है। प्रकृति से प्रेम करने वाले के मन में सूर्य, नदी, पर्वत, पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के प्रति सहज सम्मान होता है। प्रकृति का विधान संतुलन पर टिका है। जीव-जंतु अपनी आवश्यकता भर ग्रहण करते हैं, जबकि अनावश्यक संचय और अंधाधुंध दोहन मनुष्य की प्रवृत्ति है। यही प्रवृत्ति प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ती है। लेकिन, क्या प्रकृति में घटने वाली हर घटना को प्रारब्ध मानकर चुप बैठ जाना चाहिए? शायद नहीं।संतोष हमें परिस्थितियों को स्वीकारना सिखाता है, लेकिन असंतोष हमें उन्हें बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करता है। यही असंतोष कर्म का आधार बन जाए तो व्यक्ति शिकायत करने के बजाय समाधान खोजता है। उस कारीगर की तरह, जो प्रतिकूल मौसम को बहाना नहीं, काम पूरा करने की चुनौती को स्वीकार करता है। इसलिए प्रकृति के साथ सामंजस्य का अर्थ उसके नियमों को समझते हुए विवेकपूर्ण कर्म करना है। असंतोष कर्म का प्रेरक बने, कुंठा का कारण नहीं। यही संतुलन व्यक्ति को स्वयं और समाज, दोनों की बेहतरी की ओर ले जाता है।