ईमानदारी का कीड़ा

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the worm of honesty when poet and teacher jibed at the system
स्वतंत्रता दिवस बीत गया। कवि उदास है। उसने तैयारी कर रखी थी। नई कविताएं लिखी थीं। कुर्ते-पायजामे पर कलफ कर ली थी। उम्मीद थी कि वरिष्ठता को देखते हुए इस बार लाल किले पर कविता पाठ का न्योता जरूर आएगा, पर नहीं आया। उसकी क्रांति कागजों में रह गई।

निराश कवि चाय की टपरी पर पहुंचा। 'अमां, एक चाय और बोल दीजिए, कटिंग ही सही।' मास्साब आकर उसके बगल में बैठ गए। कवि ने नजर उठाई और चाय वाला समझ गया। कवि ने मास्साब की ओर देखते हुए कहा, 'कोई समझे न समझे, यह चाय वाला मुझे समझता है।' मास्साब के चेहरे पर प्रश्नवाचक भाव उभरे, 'सही में?' उन्होंने कवि के कंधे पर हाथ रखा और कहा, 'मुझे भी उम्मीद थी कि शिक्षा के नियम कायदे तय करने के लिए मुझे बुलाया जाएगा, पर नहीं बुलाया गया। असल में तुम दिमाग से कविता लिखते हो और लोगों को दिमाग पसंद नहीं। जज्बाती कविता लिखा करो।' कवि ने कहा, 'मास्साब, लिखता तो दिल से ही हूं, पर कविता खुद-ब-खुद दिमाग की ओर मुड़ जाती है।' 'ऐसा क्यों होता है?' 'देश के जो हालात हैं, उनके कारण', कवि की आंखों में जर्जर व्यवस्था का प्लास्टर झड़ रहा था। 'मैं बच्चों पर लिखने बैठता हूं तो खस्ताहाल स्कूल सामने आ जाते हैं। युवाओं के प्रेम पर लिखता हूं तो कविता बेरोजगारी की ओर मुड़ जाती है। प्रेयसी का सौंदर्य वर्णन करता हूं तो बात महिला हिंसा की ओर घूम जाती है। बताइए क्या करूं?'
'ईश्वर का नाम लो...', कहते-कहते जाने क्यों मास्साब रुक गए। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और खिलखिला दिए। कविवर बोले, 'मास्साब आप भी...।' लंबी बातचीत के बाद दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उनके दिमाग में ईमानदारी का कीड़ा है। वे डॉक्टर के पास पहुंचे, 'आपके पास ईमानदारी के कीड़े का इलाज है।' डॉक्टर ने साफ कहा, 'नहीं।' फिर तीनों साथ हंसे। दोनों ने कहा, 'डॉक्टर साहब आप भी...।'