Royal Journey Of Uttarakhandi Flavors In Rashtrapati Bhavan From Jakhiya Aloo To Naal Badi
पहाड़ाें से राष्ट्रपति भवन के किचन तक, उत्तराखंडी ज़ायके का शाही सफर
नवभारत टाइम्स•
राष्ट्रपति भवन में पहाड़ी व्यंजनों का शाही सफर तय हुआ है। गणतंत्र दिवस पर परोसी गई थाली में जखिया आलू, हरे टमाटर की चटनी, झंगोरे की खीर और थिंचोणी जैसे पारंपरिक स्वाद शामिल थे। हिमालयी खानपान को नए फ्यूजन के साथ पेश किया गया।
नई दिल्ली: गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति भवन में आयोजित 'एट होम' कार्यक्रम में पहाड़ी खानपान का जलवा देखने को मिला। वीआईपी मेहमानों को परोसी गई थाली में उत्तराखंड के पारंपरिक जायकों को नए अंदाज़ में पेश किया गया। जखिया आलू , हरे टमाटर की चटनी, झंगोरे की खीर , थिंचोणी और नींबू सान जैसी चीज़ों ने सबका मन मोह लिया। खास बात यह रही कि झंगोरे की खीर को मेघालय के मिया बेरी सॉल्ट और वाइट चॉकलेट के साथ परोसा गया, जो एक अनूठा फ्यूजन था। बिच्छू घास (नेटल लीव्स) से बनी 'बिच्छू बूटी पत्ता' डिश भी मेनू का हिस्सा थी, जिसे हिमालयी सरसों और लौकी के साथ तैयार किया गया था।
पहाड़ी खानपान को 25 सालों से बढ़ावा दे रहीं कलिनरी कंसल्टेंट रुशिना मनशॉ घिल्डियाल ने इस बात पर खुशी जताई कि उत्तराखंडी फूड को वीआईपी मेनू में जगह मिली है। उन्होंने बताया कि वह खुद भी शादी के बाद से उत्तराखंडी खाने को एक्सप्लोर और प्रमोट कर रही हैं। रुशिना ने बताया कि 2016 में उन्होंने जिस 'जखिया आलू' डिश को यह नाम दिया था, आज वह इसी नाम से मशहूर हो रही है। पहले इसे सिर्फ 'आलू गुटका' कहा जाता था।वीआईपी मेनू में शामिल जखिया आलू की खासियत उसका तड़का है, जिसमें जखिया का इस्तेमाल होता है। रुशिना, जिन्होंने देशभर की चटनियों पर 230 प्रकारों की किताब लिखी है, बताती हैं कि जखिया पहले पहाड़ों पर मुफ्त में उगता था। इसे कोई उगाता नहीं था, बल्कि यह जंगलों में खरपतवार की तरह उगता था। भोटिया समुदाय इसे बेचता था। जहां देश के बाकी हिस्सों में तड़के में जीरा इस्तेमाल होता था, वहीं पहाड़ों में आसानी से उगने वाले जखिया, भांगजीरा और भांग ने तड़के में अपनी जगह बनाई।
रुशिना के अनुसार, उत्तराखंडी खानपान स्वाद और सेहत से भरपूर है। कोविड-19 महामारी के बाद लोगों ने इस बात को और भी गहराई से समझा है। जब उनसे पूछा गया कि कौन सी उत्तराखंडी डिशेस हैं जिनका स्वाद दुनिया के सामने अभी आना बाकी है, तो उन्होंने चैंसू, फाणू और पिस्यूंलूण के अलावा ' नाल बड़ी ' का जिक्र किया। रुशिना ने बताया कि 'नाल बड़ी' एक स्वादिष्ट और पौष्टिक डिश है जिसे प्रमोट किए जाने की सख्त जरूरत है, क्योंकि यह लुप्त हो रही है।
'नाल बड़ी' अरबी के तने से बनती है। इसके तने पर उड़द दाल का लेप लगाया जाता है, फिर उसे सुखाकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। इसे दाल या करी में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे बनाने की प्रक्रिया भी काफी दिलचस्प है। जिस तरह कपड़े सुखाने के लिए रस्सी पर लटकाए जाते हैं, उसी तरह 'नाल बड़ी' को भी रस्सी पर लटकाकर सुखाया जाता है। धूप में सुखाने से उड़द की परत सूख जाती है और अरबी की डंडी पाइप जैसी बन जाती है। रुशिना इसे उत्तराखंड की 'डाइंग आर्ट' कहती हैं, जिसे बचाने की जरूरत है।
रुशिना बताती हैं कि वे अपने घर पर हर साल 'नाल बड़ी' बनाती हैं। इसके लिए अच्छी अरबी की डंडी और बनाने का हुनर चाहिए। बाजार में मिलने वाली 'नाल बड़ी' में वह बात नहीं होती। यह हाई प्रोटीन और फाइबर से भरपूर होने के कारण बहुत सेहतमंद होती है।
पहाड़ी खानपान की बात करें तो राष्ट्रपति भवन के मेनू में हिमालयी राज्यों के खानपान को नए फ्यूजन के साथ पेश किया गया था। झंगोरे की खीर को मेघालय के मिया बेरी सॉल्ट (मिया लूण) और वाइट चॉकलेट के साथ परोसना एक अनूठा प्रयोग था। बिच्छू घास, जिसे पहाड़ी रास्तों पर अक्सर देखा जाता है, उससे बनी 'बिच्छू बूटी पत्ता' डिश भी खास थी। इसे हिमालयी सरसों और लौकी के साथ तैयार किया गया था। यह दिखाता है कि कैसे पारंपरिक पहाड़ी सामग्री को आधुनिक तरीके से पेश किया जा सकता है।
जखिया आलू की बात करें तो इसका तड़का इसे खास बनाता है। जखिया एक ऐसा मसाला है जो पहाड़ों की अपनी पहचान है। यह जीरे की तरह ही तड़के में इस्तेमाल होता है, लेकिन इसका स्वाद अलग होता है। रुशिना ने बताया कि कैसे स्थानीय सामग्री ने तड़के में अपनी जगह बनाई, जबकि बाकी देश में जीरा इस्तेमाल होता था। यह पहाड़ी व्यंजनों की विविधता और स्थानीयता को दर्शाता है।
कुल मिलाकर, राष्ट्रपति भवन में पहाड़ी खानपान को मिली यह जगह उत्तराखंडी व्यंजनों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यह न केवल इन स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजनों को पहचान दिलाता है, बल्कि उन्हें संरक्षित करने और बढ़ावा देने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। रुशिना जैसी हस्तियों के प्रयासों से यह उम्मीद जगी है कि 'नाल बड़ी' जैसी लुप्त हो रही कलाएं भी फिर से जीवित होंगी और दुनिया भर के लोग इन अनूठे पहाड़ी जायकों का आनंद ले सकेंगे।