असाधारण किंकरी

नवभारत टाइम्स

हिमाचल प्रदेश की किंकरी देवी ने खनन के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उन्होंने पहाड़ों को टूटते और जल स्रोतों को प्रदूषित होते देखा। अन्याय के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई। अदालत में याचिका दायर की और भूख हड़ताल की। उनके दृढ़ संकल्प से खनन पर रोक लगी। सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके पक्ष में फैसला सुनाया। किंकरी देवी को अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला।

असाधारण किंकरी
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के घाटों गांव में 1925 में जन्मी किंकरी देवी , जिन्होंने कभी औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, ने प्रकृति के प्रति अपनी गहरी संवेदनशीलता के बल पर चूना-पत्थर खनन के खिलाफ एक असाधारण लड़ाई लड़ी। गरीबी, कम उम्र में विवाह और 22 साल की उम्र में विधवा होने के बावजूद, उन्होंने सफाईकर्मी के रूप में काम करते हुए देखा कि कैसे अंधाधुंध खनन से पहाड़ टूट रहे हैं, पानी गंदा हो रहा है, खेती बर्बाद हो रही है और जंगल खत्म हो रहे हैं। इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हुए, उन्होंने 1987 में स्थानीय संस्था की मदद से 48 खदान मालिकों के खिलाफ शिमला हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। जब सुनवाई नहीं हुई, तो उन्होंने अदालत के बाहर 19 दिनों तक भूख हड़ताल की। उनके इस दृढ़ संकल्प का असर हुआ कि अदालत ने खनन और पहाड़ों की तोड़फोड़ पर रोक लगा दी। बाद में, 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उनके पक्ष में फैसला सुनाया। किंकरी देवी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और 1999 में उन्हें ‘स्त्री शक्ति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि एक आम इंसान भी अपनी पक्की इच्छाशक्ति और हिम्मत से बड़े बदलाव ला सकता है।

किंकरी देवी का जन्म हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के घाटों गांव में हुआ था। उनका जन्म साल 1925 में हुआ था। उन्हें स्कूल जाने का मौका नहीं मिला, लेकिन वे प्रकृति को बहुत अच्छे से समझती थीं। बचपन में ही गरीबी ने उन्हें घेर लिया था। बहुत कम उम्र में उनकी शादी हो गई थी। जब वे सिर्फ 22 साल की थीं, तब वे विधवा हो गईं। इसके बाद, उन्होंने अपना गुजारा चलाने के लिए सफाईकर्मी का काम शुरू किया।
सफाईकर्मी के तौर पर काम करते हुए किंकरी देवी ने एक बहुत ही चिंताजनक बात देखी। उन्होंने देखा कि उनके इलाके में चूना-पत्थर का खनन बहुत ही बेतरतीब तरीके से हो रहा था। इस खनन की वजह से पहाड़ टूट रहे थे। पीने का पानी भी गंदा हो रहा था। खेतों में फसलें बर्बाद हो रही थीं और जंगल भी धीरे-धीरे खत्म हो रहे थे। यह सब देखकर किंकरी देवी को बहुत दुख हुआ और उन्होंने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया।

उन्होंने हार नहीं मानी। साल 1987 में, उन्होंने एक स्थानीय संस्था की मदद ली। इस संस्था के साथ मिलकर उन्होंने 48 खदान मालिकों के खिलाफ शिमला हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की। जनहित याचिका का मतलब है कि उन्होंने आम लोगों के भले के लिए यह केस लड़ा। लेकिन जब उनकी याचिका पर सुनवाई नहीं हुई, तो किंकरी देवी ने एक बहुत बड़ा कदम उठाया। वे अदालत के बाहर 19 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठ गईं।

उनके इस अटूट संकल्प और हिम्मत का नतीजा यह हुआ कि अदालत ने खनन पर और पहाड़ों को तोड़ने पर रोक लगा दी। यह एक बहुत बड़ी जीत थी। बाद में, साल 1995 में, सुप्रीम कोर्ट ने भी किंकरी देवी के पक्ष में फैसला सुनाया। इस तरह, उन्होंने पर्यावरण को बचाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

किंकरी देवी की इस लड़ाई को दुनिया भर में सराहा गया। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। साल 1999 में, उन्हें भारत सरकार की ओर से ‘स्त्री शक्ति पुरस्कार’ से नवाजा गया। यह पुरस्कार उन महिलाओं को दिया जाता है जिन्होंने समाज में महत्वपूर्ण बदलाव लाए हों। किंकरी देवी का जीवन हमें यह सिखाता है कि अगर किसी व्यक्ति में दृढ़ इच्छाशक्ति और साहस हो, तो वह एक आम इंसान होते हुए भी बड़े से बड़े बदलाव ला सकता है। उन्होंने साबित कर दिया कि कोई भी व्यक्ति छोटा नहीं होता, अगर उसके इरादे नेक हों।