दल नहीं, सदन का होता है स्पीकर

नवभारत टाइम्स

लोकसभा में विपक्ष ने अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है। यह कदम उनके कामकाज पर सवाल उठाता है। हालांकि, संख्या बल के अभाव में प्रस्ताव के पास होने की संभावना कम है। तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इस पहल से दूरी बना ली है। अध्यक्ष का पद निष्पक्षता का प्रतीक है।

speaker belongs to the house not the party questions on impartiality
लोकसभा में विपक्ष ने स्पीकर ओम बिरला को हटाने का नोटिस देकर एक बड़ा कदम उठाया है। यह उनके कामकाज और कथित पक्षपात के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध है। हालांकि, संख्या बल को देखते हुए यह प्रस्ताव पास होने की संभावना नहीं है। अब तक 118 सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इससे दूरी बना ली है, जिससे विपक्ष की ताकत कमजोर हुई है। यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने स्पीकर के खिलाफ ऐसा कदम उठाया है; 2022 में उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी तृणमूल कांग्रेस ने वोटिंग का बहिष्कार किया था। स्पीकर सदन का सबसे बड़ा अधिकारी होता है और उसकी ताकत ही सदन की ताकत मानी जाती है। लोकसभा की व्यवस्था ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स के मॉडल पर आधारित है, जहां एक समय स्पीकर के खिलाफ कोई पार्टी उम्मीदवार नहीं उतारती थी और स्पीकर पूरी निष्पक्षता से काम करता था। इसका एक बड़ा उदाहरण 'डेनिसन का नियम' है, जब स्पीकर जॉन एवलिन डेनिसन ने व्यक्तिगत रूप से समर्थन के बावजूद एक विधेयक के खिलाफ वोट दिया था, क्योंकि उन्हें लगा कि इतने विरोध वाले बिल को सिर्फ स्पीकर के वोट से पास नहीं करना चाहिए। भारत में, लोकसभा अध्यक्ष अपने राजनीतिक दल से इस्तीफा नहीं देता, जबकि ब्रिटेन में स्पीकर निर्वाचित होने के बाद दल से इस्तीफा दे देता है। 2008 में, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने अपने ही दल के लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को इस्तीफा देने को कहा था, जब पार्टी ने UPA सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। चटर्जी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया और पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया, जिससे उन्होंने यह संदेश दिया कि वे पार्टी नहीं, बल्कि सदन के अध्यक्ष हैं। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की परंपरा पहली लोकसभा से ही चली आ रही है, लेकिन अब तक ऐसे सभी प्रस्ताव गिर गए हैं। ओम बिरला ने खुद को कार्यवाही से अलग कर लिया, जिसे एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। विपक्ष का आरोप है कि नेता प्रतिपक्ष को बोलने नहीं दिया गया, जबकि विपक्ष को अपनी बात रखने का पूरा हक है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ती कटुता लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। स्पीकर की जिम्मेदारी है कि वह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को बराबर मौका दे और सदन की कार्यवाही ठीक से चलाए। स्पीकर को न सिर्फ निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए। पिछले कई दशकों से पीठासीन अधिकारी निष्पक्षता का निर्वाह नहीं कर रहे हैं, और राज्यों में भी हालात ऐसे ही हैं। निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह कानून बनाया जा सकता है कि जो व्यक्ति एक बार अध्यक्ष या सभापति बन जाए, वह बाद में सक्रिय राजनीति में न लौटे। अध्यक्ष के पास बड़े अधिकार होते हैं, इसलिए उन्हें पूरे सदन का भरोसा जीतना चाहिए। सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि इस पद की गरिमा बनी रहे।

विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है। यह कदम उनके कामकाज और कथित पक्षपात के विरोध में उठाया गया है। हालांकि, सदन में बहुमत सरकार के पास होने के कारण इस प्रस्ताव के पास होने की उम्मीद बहुत कम है। इस नोटिस पर अब तक 118 सांसदों के हस्ताक्षर हो चुके हैं। लेकिन, इस मामले में एक बड़ी बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे प्रमुख विपक्षी दलों ने इस पहल से खुद को अलग रखा है। इससे विपक्ष की एकजुटता पर सवाल उठ रहे हैं और उनकी ताकत कमजोर हो गई है।
यह कोई पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने स्पीकर के खिलाफ ऐसा कदम उठाया है। 2022 में उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी तृणमूल कांग्रेस ने वोटिंग का बहिष्कार किया था। उस समय उनके इस कदम से जगदीप धनखड़ को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा मिला था। इस बार भी तृणमूल कांग्रेस के अलग रहने से विपक्षी सांसदों की संख्या कम हो गई है। लेकिन, यह सिर्फ संख्या का खेल नहीं है।

लोकसभा अध्यक्ष सदन का सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी होता है। उसकी शक्ति ही सदन की शक्ति मानी जाती है। भारत की लोकसभा की व्यवस्था ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स के मॉडल पर आधारित है। ब्रिटेन में एक समय ऐसी परंपरा थी कि अगर कोई व्यक्ति स्पीकर बन जाता था, तो अगली बार कोई भी राजनीतिक दल उसके खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारता था। उस समय स्पीकर पूरी निष्पक्षता से काम करता था।

इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण 'डेनिसन का नियम' (Denison’s Rule) है। जॉन एवलिन डेनिसन 1857 से 1872 तक स्पीकर रहे। साल 1867 में, ट्रिनिटी कॉलेज, डबलिन से जुड़ा एक विधेयक सदन में आया। उस विधेयक पर पक्ष और विपक्ष के वोट बराबर हो गए। जब ऐसे हालात बनते हैं, तो स्पीकर को अपना निर्णायक मत यानी कास्टिंग वोट देना पड़ता है। डेनिसन ने उस विधेयक के खिलाफ वोट दिया, जबकि व्यक्तिगत रूप से वह उसके समर्थन में थे। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उनका मानना था कि अगर किसी बिल का इतना विरोध है कि वोट बराबर हो जाएं, तो उसे सिर्फ स्पीकर के वोट से कानून नहीं बनाना चाहिए। ऐसे मामलों में और बहस होनी चाहिए।

हालांकि, आज ब्रिटेन में भी पार्टियां स्पीकर के खिलाफ उम्मीदवार खड़े करने लगी हैं। लेकिन, वहां आज भी एक अच्छी परंपरा है कि स्पीकर चुने जाने के बाद अपने राजनीतिक दल से इस्तीफा दे देता है।

भारत में स्थिति थोड़ी अलग है। लोकसभा अध्यक्ष अपने राजनीतिक दल से इस्तीफा नहीं देता है। 2008 में एक ऐसी ही अजीब स्थिति बनी थी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने UPA सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। उसी दल के सोमनाथ चटर्जी उस समय लोकसभा अध्यक्ष थे। पार्टी ने उनसे इस्तीफा देने को कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया। सोमनाथ चटर्जी ने इस्तीफा न देकर यह साबित किया कि वह किसी पार्टी के नहीं, बल्कि पूरे सदन के अध्यक्ष हैं। अगर वह इस्तीफा दे देते, तो उनके फैसलों पर पक्षपात के आरोप लग सकते थे।

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की परंपरा भारत में पहली लोकसभा से ही शुरू हो गई थी। 18 दिसंबर 1954 को जहानाबाद के समाजवादी सांसद विज्ञेश्वर मिश्र ने अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। उस समय भी आरोप निष्पक्षता का ही था, लेकिन प्रस्ताव गिर गया था। 1966 में हुकुम सिंह के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन जरूरी समर्थन न मिलने के कारण उसे स्वीकार नहीं किया गया।

नियम के अनुसार, जब अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा होती है, तो वह खुद पीठासीन अधिकारी के तौर पर सदन में नहीं बैठते। ओम बिरला ने चर्चा शुरू होने से पहले ही खुद को कार्यवाही से अलग कर लिया, जिसे एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है।

विपक्ष का मुख्य आरोप यह है कि नेता प्रतिपक्ष को सदन में बोलने नहीं दिया गया। विपक्ष को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन सिर्फ विरोध करना ही काफी नहीं है। सरकार को भी अपनी बात रखने का अधिकार है। दोनों पक्षों के बीच बढ़ती कड़वाहट लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है।

अध्यक्ष की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को बराबर का मौका दे और सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाए। अध्यक्ष को न केवल निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए। लेकिन, पिछले कई दशकों से यह देखा जा रहा है कि पीठासीन अधिकारी निष्पक्षता के अपने कर्तव्य का ठीक से निर्वाह नहीं कर रहे हैं। राज्यों में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं।

निष्पक्षता बनाए रखने के लिए एक कानून बनाया जा सकता है। इस कानून के तहत, जो व्यक्ति एक बार अध्यक्ष या सभापति बन जाए, उसे बाद में सक्रिय राजनीति में लौटने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। अध्यक्ष के पास बहुत बड़े अधिकार होते हैं, इसलिए उन्हें पूरे सदन का भरोसा जीतना चाहिए। सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष की भी यह जिम्मेदारी है कि वे इस पद की गरिमा को बनाए रखें।