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नवभारत टाइम्स

जीवन की संध्या में बुजुर्गों को सहारे की जरूरत होती है। एकल परिवारों और पलायन के कारण वे उपेक्षा और अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। प्रेम ही समाज में सौहार्द और शांति ला सकता है। स्वार्थहीन प्रेम से ही जात-पात और ऊंच-नीच के बंधन कट सकते हैं। यह प्रेम ही सृष्टि को आगे बढ़ाता है।

neglect of old age and the power of love two poignant letters from readers mail
जीवन की ढलती शाम में बुढ़ापा एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ इंसान को सबसे ज़्यादा सहारे, अपनेपन और इज़्ज़त की ज़रूरत होती है। इस उम्र में थका हुआ शरीर आराम चाहता है और मन अपनों के बीच सुरक्षित महसूस करना चाहता है। लेकिन दुख की बात यह है कि जिस समय माता-पिता को अपने बच्चों के प्यार और साथ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, उसी समय उन्हें अक्सर अनदेखा किया जाता है, अकेलापन झेलना पड़ता है और वे भावनात्मक दर्द से गुज़रते हैं। एकल परिवारों का बढ़ता चलन और नौकरी की तलाश में शहरों की ओर पलायन ने बुजुर्गों को अकेला छोड़ दिया है। हालांकि, आज भी ऐसे लोग हैं जो तन, मन और धन से अपने माता-पिता की सेवा को अपना सौभाग्य मानते हैं।

संत कबीर ने कहा है, "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।" इसका मतलब है कि किताबें पढ़कर कोई पंडित नहीं बन जाता, बल्कि प्रेम के दो अक्षर समझने वाला ही सच्चा ज्ञानी होता है। प्रेम की परिभाषा को संतों, महात्माओं और महान लोगों ने अपने-अपने तरीके से समझाया है। भगवान श्री कृष्ण की भक्त मीरा ने भगवान के प्रेम के लिए ज़हर का प्याला पी लिया था। भगवान श्री राम ने अपनी भक्त शबरी के जूठे बेर खाए थे, जो भक्तों के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है।
प्रेम के बिना इस दुनिया में न तो अच्छा माहौल बन सकता है और न ही दुनिया शांति से आगे बढ़ सकती है। प्रेम से ही धर्म, जाति, अमीर-गरीब, ऊंच-नीच के बंधन टूट सकते हैं। लेकिन यह तभी मुमकिन है जब प्रेम में कोई स्वार्थ न हो।

आजकल एकल परिवारों का चलन बढ़ रहा है। लोग नौकरी के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं। इस वजह से, अक्सर बुजुर्ग अपने बच्चों से दूर रह जाते हैं। उन्हें अकेलापन महसूस होता है और वे भावनात्मक रूप से परेशान हो जाते हैं। यह एक दुखद सच्चाई है कि जिस उम्र में उन्हें सबसे ज़्यादा सहारे की ज़रूरत होती है, उसी उम्र में उन्हें अनदेखा कर दिया जाता है।

लेकिन अच्छी बात यह है कि आज भी ऐसे लोग हैं जो अपने माता-पिता की सेवा को अपना फर्ज और सौभाग्य समझते हैं। वे तन, मन और धन से उनकी देखभाल करते हैं। यह दिखाता है कि आज भी हमारे समाज में रिश्तों की अहमियत बाकी है।

प्रेम सिर्फ इंसानों के बीच ही नहीं, बल्कि भगवान और भक्तों के बीच भी होता है। संत कबीर ने प्रेम को सबसे बड़ा ज्ञान बताया है। मीराबाई और शबरी के उदाहरण हमें सिखाते हैं कि सच्चा प्रेम क्या होता है। प्रेम ही वह शक्ति है जो दुनिया को जोड़ सकती है और शांति ला सकती है। यह तभी संभव है जब प्रेम निस्वार्थ हो, यानी उसमें कोई उम्मीद या स्वार्थ न हो।