Parliamentary Stalemate Discussion Not Possible Without Governments Consent Is Oppositions Voice Being Suppressed
सरकार की सहमति बिना चर्चा संभव नहीं
नवभारत टाइम्स•
संसद में हंगामा और चर्चा की कमी चिंता का विषय है। पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने बताया कि सरकार की सहमति के बिना राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा संभव नहीं है। विपक्ष को बोलने की आजादी मिलनी चाहिए। राष्ट्रपति की भूमिका सीमित है। बिना बहस बिल पास करना अनुच्छेद 107 का उल्लंघन है।
संसद में बढ़ते हंगामे और गतिरोध पर लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने अजय प्रताप तिवारी के साथ एक खास बातचीत में कई अहम मुद्दों पर प्रकाश डाला। आचार्य ने बताया कि सांसदों का निलंबन सदन का फैसला होता है, स्पीकर सिर्फ नाम बताते हैं और फिर मंत्री प्रस्ताव लाते हैं जिस पर वोटिंग होती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा का अधिकार विपक्ष को है, लेकिन इसके लिए सत्ता पक्ष की सहमति जरूरी है, जो अक्सर नहीं मिलती। राष्ट्रपति की भूमिका पर उन्होंने कहा कि वे मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना कोई संदेश नहीं भेज सकते और गतिरोध में वे कुछ नहीं कर सकते। बिना बहस के बिल पास होने को अनुच्छेद-107 का उल्लंघन बताते हुए उन्होंने कहा कि इसके लिए दोनों सदनों की समझ और सहमति जरूरी है। आचार्य ने इस बात पर जोर दिया कि संसद तभी ठीक से काम कर सकती है जब विपक्ष को लगे कि उसकी बात सुनी जा रही है। उन्होंने अनुच्छेद 105 के तहत सांसदों की बोलने की आजादी का जिक्र करते हुए कहा कि यह नियमों के दायरे में है, लेकिन किसी पर दबाव नहीं होना चाहिए। अंत में, उन्होंने गतिरोध खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के बीच संवाद को बेहद जरूरी बताया, जो दूसरे देशों में एक आम प्रथा है।
संसद में आजकल काम से ज्यादा हंगामा देखने को मिल रहा है। सरकार का कहना है कि विपक्ष काम नहीं करने दे रहा, जबकि विपक्ष का आरोप है कि उसे बोलने ही नहीं दिया जा रहा। इस बढ़ते टकराव और गतिरोध के पीछे क्या कारण हैं, स्पीकर की क्या शक्तियां हैं, संविधान क्या कहता है और विपक्ष को बोलने की कितनी आजादी मिलनी चाहिए, इन सब पर लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने विस्तार से बात की।सांसदों को निलंबित करने का क्या है संवैधानिक आधार? जब लोकसभा स्पीकर किसी विपक्षी सांसद को निलंबित करते हैं, तो यह सीधे स्पीकर का फैसला नहीं होता। पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य बताते हैं कि सांसदों का निलंबन तो पूरा सदन करता है। स्पीकर का काम सिर्फ उन सांसदों के नाम सदन में बताना होता है। इसके बाद, निलंबन का प्रस्ताव सदन में लाया जाता है। यह प्रस्ताव आमतौर पर कोई मंत्री लेकर आते हैं। फिर इस प्रस्ताव पर वोटिंग होती है और उसके बाद ही सांसदों को निलंबित किया जाता है। यह प्रक्रिया सदन की कार्यप्रणाली का हिस्सा है।
राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा का अधिकार क्या विपक्ष को राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर चर्चा करने का संवैधानिक अधिकार है? आचार्य के अनुसार, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत सदन में सभी सदस्यों को बोलने की आजादी दी गई है। यह आजादी कुछ नियमों और पाबंदियों के दायरे में आती है। डोकलाम जैसे राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर चर्चा करने का विपक्ष को पूरा अधिकार है। विपक्ष कोई भी मुद्दा उठा सकता है और उस पर चर्चा कराने की मांग कर सकता है। हालांकि, नियम यह भी कहता है कि जिस विषय पर चर्चा होनी है, उसके लिए एक विशेष एडवाइजरी कमेटी बैठती है। इस कमेटी की अध्यक्षता स्पीकर करते हैं। यही कमेटी तय करती है कि सदन में किस विषय पर चर्चा होगी और किस पर नहीं। आचार्य ने बताया कि विपक्ष ने डोकलाम पर चर्चा की मांग रखी थी, लेकिन सत्ता पक्ष इस पर सहमत नहीं हुआ। जब सरकार ही सहमत न हो, तो चर्चा कराना मुश्किल हो जाता है। सत्ता पक्ष की सहमति के बिना किसी भी मुद्दे पर चर्चा संभव नहीं है। इसी वजह से विपक्ष अक्सर गुस्से में रहता है कि उसकी बात सुनी ही नहीं जाती।
संसदीय गतिरोध में राष्ट्रपति की भूमिका जब संसद में गतिरोध की स्थिति बनती है, तो राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका क्या होती है, खासकर सत्र को स्थगित करने के मामले में? अनुच्छेद 85 के तहत राष्ट्रपति सदन को संदेश भेज सकते हैं। यह संदेश किसी विधेयक या किसी अन्य विषय से संबंधित हो सकता है। लेकिन, राष्ट्रपति ऐसा कोई भी संदेश प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना नहीं भेज सकते। आचार्य स्पष्ट करते हैं कि जब संसद में गतिरोध होता है, तो राष्ट्रपति सीधे तौर पर कुछ नहीं कर सकते। वे मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करते हैं।
बिना बहस के बिल पास होना: अनुच्छेद-107 का उल्लंघन? आचार्य के अनुसार, बिना बहस के बिल पास करना अनुच्छेद-107 का उल्लंघन माना जा सकता है। अनुच्छेद-107 में कहा गया है कि जब तक दोनों सदनों की सहमति नहीं होती, तब तक कोई बिल पास नहीं हो सकता। सहमति का मतलब है कि दोनों सदनों को बिल की विषय वस्तु को समझना चाहिए। आचार्य कहते हैं कि अगर 'एग्रीमेंट' (सहमति) शब्द की जगह 'एडॉप्ट' (अपनाना) शब्द का प्रयोग होता, तो हम कह सकते थे कि कुछ भी अपना लिया गया। लेकिन, अनुच्छेद-107 में 'एग्रीमेंट' शब्द का मतलब है कि दोनों सदनों को यह समझना चाहिए कि वे किस बात पर सहमत हो रहे हैं, और इसके लिए चर्चा बहुत जरूरी है।
विपक्ष का हंगामा और सत्ता पक्ष का बहुमत: संविधान की मूल संरचना पर असर? क्या विपक्ष के हंगामे और सत्ता पक्ष के बहुमत का इस्तेमाल संविधान की मूल संरचना को प्रभावित करता है? आचार्य का मानना है कि इसका संविधान की मूल संरचना से कोई सीधा मतलब नहीं है। सदन को चलाने के लिए स्पीकर होते हैं। सदन पक्ष और विपक्ष के तालमेल से ही चलता है। विपक्ष को अपनी बात कहने के लिए पूरी आजादी मिलनी चाहिए, जबकि सरकार अपने तरीके से काम करती है। संसद इसलिए नहीं चल पाती क्योंकि अक्सर विपक्ष की बातों को अनसुना कर दिया जाता है। आचार्य जोर देते हैं कि संसद में ज्यादातर विषयों पर चर्चा होनी चाहिए। संसद तभी पूरी तरह से काम कर पाएगी जब विपक्ष को यह विश्वास हो जाएगा कि उसकी बात सुनी जा रही है।
संसदीय विशेषाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी संसदीय विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105) के तहत विपक्षी सांसदों को कितनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए? आचार्य बताते हैं कि अनुच्छेद 105 के तहत सदन में सभी सदस्यों को बोलने की आजादी है, लेकिन यह नियमों के अधीन है। इसका मतलब यह नहीं कि नियम संविधान के अनुच्छेद पर हावी हो जाएं। सभी सदस्यों को सदन में बोलने की आजादी मिलनी चाहिए। जो बातें अशोभनीय हैं, उन्हें बहस से हटा देना चाहिए। सदस्यों को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि उन पर किसी का दबाव है। आजादी कोई लाइसेंस नहीं है, यह एक अधिकार है। अपनी बात कहने के लिए आजादी मिलनी ही चाहिए।
गतिरोध समाप्त करने के लिए संवाद की आवश्यकता संसदीय गतिरोध को समाप्त करने के लिए प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के बीच संवाद संवैधानिक रूप से कितना बाध्यकारी हो सकता है? आचार्य का मानना है कि प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के बीच संवाद होना ही चाहिए। इससे गतिरोध दूर हो सकते हैं। संसदीय प्रक्रिया के तहत प्रधानमंत्री और विपक्ष के बीच बातचीत चलती रहती है। दूसरे देशों में प्रधानमंत्री कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विपक्ष को विश्वास में लेते हैं। जहां भी संसदीय प्रणाली है, वहां यह एक आम प्रथा है। इससे विपक्ष का तनाव कम होता है और सदन में गतिरोध दूर हो जाता है। लेकिन, दुर्भाग्यवश, भारत में ऐसा अक्सर नहीं होता।