‘कैंसर के इलाज में जीनोम सीक्वेसिंग बनेगी गेम चेंजर’

नवभारत टाइम्स

कैंसर के इलाज में जीनोम सीक्वेसिंग एक बड़ा बदलाव लाएगी। भारतीयों में पाए गए अनूठे आनुवांशिक बदलावों से सटीक इलाज संभव होगा। जीनोम विश्लेषण से ट्यूमर के म्यूटेशन का पता चलेगा और सही दवा का चुनाव हो सकेगा। इससे भविष्य में व्यक्ति-विशेष दवाएं उपलब्ध होंगी। आईआईटी कानपुर इस क्षेत्र में शोध का राष्ट्रीय हब बनेगा।

genome sequencing to be a game changer in cancer treatment revelation in iit kanpur research
कानपुर: कैंसर के इलाज में एक नई उम्मीद जगी है। देश भर के 10,000 लोगों के जीनोम सीक्वेंसिंग (डीएनए की पूरी जानकारी) से पता चला है कि 34% आनुवांशिक बदलाव (एसएनपी) भारतीयों में ऐसे हैं जो दुनिया की किसी और आबादी में नहीं पाए जाते। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज कैंसर के सटीक और हर मरीज के लिए खास इलाज को संभव बना सकती है।

IIT कानपुर में हुई ANRF–PAIR कॉन्फ्रेंस में प्रोफेसर बुशरा अतीक ने बताया कि कैंसर की कोशिकाएं भले ही एक जैसी दिखें, लेकिन जीनोम के स्तर पर उनमें बहुत अंतर होता है। इसी वजह से कभी-कभी एक ही दवा सारे ट्यूमर पर असर नहीं करती। शुरुआत में ट्यूमर कम हो जाता है, लेकिन बाद में फिर से बढ़ जाता है। जीनोम विश्लेषण से यह पता चलेगा कि किस ट्यूमर में क्या बदलाव या म्यूटेशन है और कौन सी दवा किस रास्ते पर काम करेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि जीनोम सीक्वेंसिंग पर आधारित इलाज से भविष्य में हर व्यक्ति के लिए खास दवाएं ( पर्सनलाइज्ड मेडिसिन ) बनाना मुमकिन होगा। इससे हम यह भी समझ पाएंगे कि बीमारी की पहचान के लिए कौन सा कैंसर बायोमार्कर (बीमारी का संकेत देने वाला तत्व) है। हम अपनी आबादी के हिसाब से इन बायोमार्कर को बदल भी सकते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जोड़कर इलाज को और बेहतर बनाया जा सकता है।

यह भी बता दें कि IIT कानपुर को कैंसर पर रिसर्च के लिए देश का एक बड़ा केंद्र बनाया गया है। इसके साथ सीएसजेएम यूनिवर्सिटी कानपुर, केजीएमयू लखनऊ, रेवेनशॉ यूनिवर्सिटी ओडिशा और NIT अरुणाचल प्रदेश को भी इस रिसर्च प्रोग्राम से जोड़ा गया है। इसका मकसद यह है कि ये सभी संस्थान मिलकर कैंसर रिसर्च के लिए एक मजबूत माहौल तैयार करें।

जीनोम सीक्वेंसिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति के डीएनए की पूरी जानकारी को पढ़ा जाता है। डीएनए में हमारे शरीर को बनाने और चलाने के निर्देश होते हैं। जीनोम सीक्वेंसिंग से हमें यह पता चलता है कि हमारे डीएनए में क्या-क्या खास बातें हैं, जैसे कि कोई बीमारी होने का खतरा या किसी दवा का असर कैसा होगा।

एसएनपी या सिंगल न्यूक्लियोटाइड पॉलिमॉरफिज्म का मतलब है डीएनए में एक छोटे से बदलाव। ये बदलाव हर इंसान में थोड़े-थोड़े अलग होते हैं और यही हमें एक-दूसरे से अलग बनाते हैं। जब ये बदलाव किसी बीमारी से जुड़े होते हैं, तो वे उस बीमारी के होने के खतरे को बढ़ा या घटा सकते हैं।

प्रोफेसर बुशरा अतीक ने कहा, "कैंसर कोशिकाएं (सेल्स) दिखने में समान लग सकती हैं, लेकिन जीनोम स्तर पर उनमें बहुत विविधता होती है। इसी कारण कई बार एक ही दवा सभी ट्यूमर सेल्स पर समान रूप से काम नहीं करती। एक समय बाद ट्यूमर घटना कम हो जाएगा या फिर दोबारा विकसित हो जाता है।"

उन्होंने आगे कहा, "जीनोम विश्लेषण बताएगा कि किस ट्यूमर में किस तरह का बदलाव या म्यूटेशन है और किस पाथवे पर कौन सी दवा प्रभावी होगी।"

यह रिसर्च भारतीयों के लिए कैंसर के इलाज को ज्यादा असरदार बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे न केवल इलाज बेहतर होगा, बल्कि बीमारियों की रोकथाम और पहचान में भी मदद मिलेगी।