गांधीनगर मार्केट का मेरठ से ख़ास नाता

नवभारत टाइम्स

नमो भारत रैपिड रेल ने मेरठ और दिल्ली को करीब ला दिया है। अब 55 मिनट में सफर पूरा होता है। इससे मेरठ के लोगों के लिए दिल्ली में नौकरी करना आसान हो गया है। मकान सस्ते होने से लोगों की जेब में पैसे बचेंगे। कनेक्टिविटी बढ़ने से नौकरी के अवसर बढ़ेंगे।

namo bharat rapid rail distance between meerut and delhi reduced to 55 minutes gandhinagar market has special connection with meerut
पूर्वी दिल्ली के शाहदरा के रहने वाले नरेश कौशिक के घर के बुजुर्गों की मानें तो कभी यमुनापार का पूरा इलाका मेरठ जिले का हिस्सा हुआ करता था। लेकिन, 22 मई, 1914 को शकरपुर, खिचड़ीपुर, चौहान बांगर, मंडावली, शाहदरा, ताहिरपुर, झिलमिल, जाफराबाद जैसे मेरठ के 65 गांवों को दिल्ली में मिला दिया गया था। दिल्ली के देश की राजधानी बनने के बाद नई इमारतों के निर्माण के लिए यह विलय किया गया था। इसी इलाके में आगे चलकर सैकड़ों ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी और कई ‘विहार’ बसे। अब नमो भारत रैपिड रेल के शुरू होने से मेरठ एक बार फिर दिल्ली के करीब आ गया है। इस ट्रेन से दोनों शहरों के बीच की दूरी सिर्फ 55 मिनट में तय की जा सकती है, जबकि सड़क मार्ग से इसमें करीब दो घंटे लगते हैं। अगर ऐसी ही कोई ट्रेन 1857 की क्रांति के दौरान शुरू हो जाती तो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले मेरठ से दिल्ली सिर्फ 55 मिनट में पहुंच जाते, लेकिन उन्होंने 64 किलोमीटर की यह दूरी पैदल ही तय की थी। मेरठ से उठी क्रांति की चिंगारी को दिल्ली ने आग में तब्दील किया था। क्रांति की शुरुआत भले मेरठ में हुई हो, लेकिन दिल्ली इसका राजनीतिक केंद्र बनी। पिछले कई दशकों से मेरठ, मोदीनगर, बड़ौत के हजारों लोग रोजाना दिल्ली में नौकरी करने आते हैं। वे मेरठ शटल से तिलक ब्रिज, मिंटो ब्रिज या नई दिल्ली तक का सफर करते हैं। शटल में सफर करने वाले यात्रियों के बीच एक पारिवारिक रिश्ता बन जाता था। वे सुख-दुख में एक-दूसरे का सहारा बनते थे और अक्सर यात्रा के दौरान भजन गाते या ताश खेलते थे।

अब नमो भारत रैपिड रेल के शुरू होने से मेरठ और उसके आसपास रहने वाले लोगों के लिए दिल्ली में नौकरी करना और भी आसान हो गया है। पहले लोग जाम से परेशान रहते थे, लेकिन अब यह दिक्कत नहीं होगी। मेरठ और मोदीनगर में दिल्ली के मुकाबले मकान सस्ते हैं, जिससे लोगों की जेब पर बोझ कम पड़ेगा। कनेक्टिविटी बढ़ने से नौकरी का बाजार भी बढ़ेगा। पूर्वी दिल्ली में रहने वाले कई बुजुर्ग आज भी खुद को मेरठ का ही मानते हैं। गांधी नगर क्लॉथ मार्केट और शाहदरा के टिंबर बाजार के वैश्य और जैन समुदाय के लोग भी मूल रूप से मेरठ, गाजियाबाद, बागपत के ही रहने वाले हैं। जाहिर है, नई ट्रेन से वे अपने पैतृक शहर जल्दी पहुंच पाएंगे।
रैपिड रेल की तेज रफ्तार की वजह से अब रोजाना के यात्री शटल की जगह रैपिड रेल को ज्यादा पसंद करेंगे। कुछ लोग शायद इस ट्रेन के सफर से थोड़ा हिचकिचाएंगे, क्योंकि इसमें भजन और ताश खेलने के लिए उतना समय नहीं मिलेगा जितना शटल में मिलता था। मेरठ से दिल्ली तक रोज सफर करने वाले कवि धनंजय सिंह ने कहा कि अगर ऐसी ट्रेन पहले चलती, तो उनके पास अपने परिवार को देने के लिए ज्यादा वक्त होता।

यह रैपिड रेल सिर्फ यात्रा के समय को ही कम नहीं कर रही, बल्कि इसने इतिहास के पन्नों को भी ताजा कर दिया है। 1857 की क्रांति के दौरान मेरठ से दिल्ली तक का सफर क्रांतिकारियों के लिए कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। उन्होंने 64 किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय की थी। मेरठ से उठी क्रांति की चिंगारी को दिल्ली ने आग में तब्दील किया था। क्रांति की शुरुआत भले मेरठ में हुई हो, लेकिन दिल्ली इसका राजनीतिक केंद्र बनी।

यह नई ट्रेन लोगों के जीवन में बदलाव लाएगी। जहां एक तरफ यह लोगों के आने-जाने का समय बचाएगी, वहीं दूसरी तरफ यह मेरठ और दिल्ली के बीच आर्थिक और सामाजिक संबंधों को भी मजबूत करेगी। मेरठ और उसके आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए दिल्ली में रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। सस्ते मकान और बेहतर कनेक्टिविटी लोगों को दिल्ली के करीब लाएगी। यह ट्रेन सिर्फ एक परिवहन का साधन नहीं, बल्कि दो शहरों को जोड़ने वाला एक पुल साबित होगी, जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाएगा।