खास की आस में है ‘सावरकर सदन’

नवभारत टाइम्स

मुंबई के दादर में स्थित ‘सावरकर सदन’ आज भी उसी शान से खड़ा है। यह घर स्वातंत्र्यवीर सावरकर की यादों को संजोए हुए है। यहां आजादी के दीवाने रहा करते थे। सावरकर ने स्वयं इस घर का नाम ‘सावरकर सदन’ रखा था। 3 जून 1938 को गृह प्रवेश हुआ था। यह सदन स्वतंत्रता आंदोलन की धुरी रहा है।

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मुंबई के दादर में स्थित ' सावरकर सदन ', 88 साल बाद भी उसी शान से खड़ा है, जहाँ कभी आजादी के दीवाने रहा करते थे। यह घर, जिसे स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने अपनी कमाई से बनवाया था, आज भी उनकी यादों और राष्ट्रीय वास्तुकला का प्रतीक है। सावरकर के पौत्र और सावरकर स्मारक के चेयरमैन रणजीत सावरकर इसे 'प्रेरणास्थल' बताते हैं और इसे भूलने न देने की बात कहते हैं।

सावरकर स्मारक के सेक्रेटरी राजेंद्र वराडकर बताते हैं कि इस घर का नाम 'सावरकर सदन' खुद सावरकरजी ने रखा था और 3 जून, 1938 को इसमें गृह प्रवेश हुआ था। यह सदन स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र रहा है और इससे जुड़े कई किस्से हैं। अगस्त 1942 में 'भारत छोड़ो' आंदोलन के दौरान सावरकर ने इस बात पर जोर दिया था कि आंदोलन का अंत 'भारत तोड़ो' के रूप में नहीं होना चाहिए। इससे पहले, मार्च 1940 में, उन्होंने पाकिस्तान की मांग का विरोध भी किया था।
व्यवस्थापक अभिजीत शिवाडीकर के अनुसार, 'सावरकर सदन' में भूतल पर डॉ. नारायणराव सावरकर और बाबाराव सावरकर रहते थे, जबकि पहली मंजिल पर बैरिस्टर तात्याराव (विनायक दामोदर) सावरकर का निवास था। भूतल के कुछ कमरे, जिनमें बैठक कक्ष भी शामिल था, सावरकरजी के इस्तेमाल के लिए थे।

सावरकर स्मारक की कोषाध्यक्ष मंजरी मराठे स्वतंत्रता काल से जुड़ी पांडुलिपियों, ताम्रपत्रों और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साथ 22 जून, 1940 को हुई मीटिंग से जुड़ी तस्वीरों को दिखाते हुए बहुत उत्साहित हो जाती हैं। वह बताती हैं कि जब देश आजाद हुआ, तब सावरकर स्वयं 'सदन' की छत पर गए और राष्ट्रध्वज फहराया था। वह राष्ट्रध्वज आज भी सुरक्षित रखा हुआ है।

अभ्यासक धनंजय शिंदे बताते हैं कि सावरकरजी के बॉडीगार्ड अप्पा कासार यहीं सीढ़ियों के नीचे की जगह पर रहते थे। आगंतुकों की व्यवस्था भी भूतल पर ही की जाती थी।

सदन की केयरटेकर अनुराधा मोघे बताती हैं कि सावरकरजी के 'करंडक' (मान-पत्र) आज भी जस के तस सहेजे हुए हैं। इसके अलावा, उनकी मूल और पारंपरिक पोशाक, छतरी, चश्मा, जूते आदि सदन के संग्रहालय में संभाल कर रखे गए हैं। आज भी सदन की ऊपरी मंजिल पर सावरकरजी के भाई की पुत्रवधू रहती हैं। बुढ़ापे की वजह से उनका आगंतुकों से मिलना-जुलना कम ही होता है।

कुल मिलाकर, स्वातंत्र्यवीर सावरकर का यह 'सदन' बहुत खास है। यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि इतिहास का एक जीता-जागता गवाह है। यहाँ की हर ईंट, हर कमरा उस दौर की गवाही देता है जब आजादी के दीवाने हर पल देश के लिए जिया करते थे। सावरकरजी ने इस घर को सिर्फ ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि अपने सपनों और संघर्षों से बनाया था।

'सावरकर सदन' की वास्तुकला भी अपने आप में खास है, जो विशुद्ध राष्ट्रीय शैली को दर्शाती है। यह उस समय की भारतीय वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण है। घर का हर कोना सावरकरजी के जीवन और उनके विचारों से जुड़ा हुआ है।

यह घर सिर्फ सावरकर परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा स्रोत है। यहाँ आकर लोग उस आजादी के संघर्ष को महसूस कर सकते हैं, जिसके लिए अनगिनत वीरों ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। सावरकरजी जैसे महान नेताओं की यादों को सहेज कर रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।

'सावरकर सदन' को देखकर यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में इसके दिन जरूर बहुरेंगे और यह आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करता रहेगा। यह घर हमें याद दिलाता है कि आजादी कोई ऐसी चीज नहीं है जो हमें मुफ्त में मिल गई हो, बल्कि इसके लिए बहुत बड़ा संघर्ष करना पड़ा है।

सावरकरजी का यह घर हमें सिखाता है कि अपने पुरखों की विरासत को संभाल कर रखना कितना जरूरी है। यह घर सिर्फ एक स्मारक नहीं, बल्कि एक जीवित इतिहास है, जो हमें हमारे अतीत से जोड़ता है और भविष्य के लिए राह दिखाता है।