Rsss Ghar Wapsi Thought Mohan Bhagwat Reveals Secrets Speaks On Relationship With Muslims
घर वापसी पर क्या है RSS की सोच
नवभारत टाइम्स•
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत देश भर में घूमकर संघ की सोच बता रहे हैं। वे जाति, धर्म और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर अपने विचार रख रहे हैं। भागवत का कहना है कि भारत हिंदू राष्ट्र है और सभी भारतीय सांस्कृतिक रूप से हिंदू हैं। वे किसी को दुश्मन नहीं मानते, बल्कि सबको साथ लाने की बात करते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत इन दिनों देश भर के दौरे पर हैं। इस दौरान उनके भाषण और सवालों के जवाब काफी चर्चा में हैं। ये यात्राएं संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में पहले से ही तय थीं। भागवत खुद संघ से जुड़े सवालों के जवाब दे रहे हैं, जो कि पहले कभी इतने विस्तार से नहीं हुआ। इस दौरे की दो खास बातें हैं - सरसंघचालक का ब्राह्मण होना और मुस्लिमों के साथ RSS का रिश्ता। भागवत ने इन मुद्दों पर खुलकर बात की है, जिससे संघ की सोच और कार्यप्रणाली को समझने में मदद मिलती है।
अक्सर यह सवाल उठता है कि संघ प्रमुख हमेशा ब्राह्मण ही क्यों होते हैं? इस पर भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ की शुरुआत ऐसे समाज में हुई थी जहाँ ब्राह्मणों की संख्या अधिक थी। इसलिए, शुरुआती कार्यकर्ता और संस्थापक भी अधिकतर ब्राह्मण ही थे। लेकिन, संघ को करीब से जानने वाले बताते हैं कि संघ में पद जाति के आधार पर नहीं, बल्कि काम और समर्पण के आधार पर मिलता है। व्यवहार में, संघ में किसी की जाति का पता नहीं चलता। नेतृत्व में अलग-अलग जातियों के लोग शामिल हैं। सरसंघचालक का चयन आपसी विश्वास और सहमति से होता है, जिसमें जाति कोई मुद्दा नहीं होती।संघ जातीय भेदभाव और संघर्ष को खत्म करने के लिए क्या रास्ता बताता है? भागवत के अनुसार, तनाव और विषमता तब पैदा होती है जब हम खुद को एक देश और एक मातृभूमि की संतान के रूप में नहीं देखते। यहीं पर 'हिंदू होने का भाव' महत्वपूर्ण हो जाता है। उनका कहना है कि ऊंच-नीच से ऊपर उठकर आपसी सद्भाव बढ़ाना बहुत जरूरी है। जो लोग पीछे रह गए हैं, उन्हें सहारा देकर आगे लाना चाहिए। समस्या यह है कि जाति विहीन समाज की बात करते हुए भी व्यवहार में जाति भेद बढ़ाने वाले बहुत लोग हैं। इसका समाधान किसी एक सरकार या संगठन से नहीं होगा, बल्कि समाज के हर व्यक्ति को प्रयास करना होगा।
कुछ लोग मुस्लिम समाज और उनकी 'घर वापसी' के मुद्दे पर भी सवाल उठाते हैं। संघ प्रमुख का कहना है कि भारत के सभी मुस्लिमों के पूर्वज हिंदू थे। वे बाहर से नहीं आए, बल्कि उन्होंने अपना धर्म बदला। जहाँ तक उनकी हिंदू धर्म में वापसी का सवाल है, तो किसी को लालच, दबाव या छल से धर्म बदलने के लिए मजबूर करना गलत है। लेकिन, अगर कोई अपनी इच्छा से वापस आना चाहे, तो उसे रोका नहीं जाना चाहिए। ऐसे लोगों की जिम्मेदारी फिर हिंदू समाज को लेनी चाहिए। इस विषय पर बोलने पर अक्सर तीखी प्रतिक्रिया होती है। कुछ मुस्लिम नेताओं, जैसे अरशद मदनी ने कड़ी आपत्ति जताई है। हालांकि भागवत ने जबरन 'घर वापसी' की बात नहीं कही, उनका वक्तव्य केवल स्वेच्छा से लौटने वालों को लेकर था।
यह सवाल भी बहुत उठता है कि क्या शाखा में मुसलमान आते हैं? इसका जवाब यही है कि शाखा में आने वालों को जाति या मजहब से नहीं, बल्कि केवल हिंदू के रूप में देखा जाता है। संघ की सोच के अनुसार, भारत में रहने वाले सभी लोग सांस्कृतिक रूप से हिंदू हैं, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो। स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद जैसे महापुरुषों ने भी यही बात कही थी।
यह भी पूछा जाता है कि क्या संघ संविधान से 'सेक्युलर' शब्द हटाकर ' हिंदू राष्ट्र ' घोषित करना चाहता है और तिरंगे की जगह भगवा लहराना चाहता है? मोहन भागवत ने इसका जवाब यह दिया कि भारत 'हिंदू राष्ट्र' है, इसे घोषित करने की जरूरत नहीं है। समस्या तब शुरू हुई जब भारत पर पश्चिमी राष्ट्रों की परिभाषा लादी गई। भारतीय चिंतन में राष्ट्र एक जीवन दर्शन है, जिसे लोगों ने जीवन शैली के रूप में अपनाया है। संघ ने कहा है कि देश में कभी भी किसी पंथ या मजहब की धार्मिक स्वतंत्रता खत्म नहीं होगी, क्योंकि यह भारत और हिंदुत्व के चरित्र के विपरीत है।
शताब्दी अभियान के दौरान आई बातों पर ध्यान दें तो कई गलतफहमियां दूर हो सकती हैं। साथ ही भारत राष्ट्र, राजनीति, जाति, समाज, सेकुलरिज्म, विकास, शिक्षा, संस्कृति और रोजगार जैसे मुद्दों पर व्यापक समझ बनती है। संघ की सोच है कि सेकुलरिज्म को धर्मनिरपेक्षता नहीं, बल्कि सम्प्रदाय तटस्थता के रूप में समझना चाहिए। संघ के सतत विस्तार का उत्तर भागवत की इस पंक्ति में है कि हमारा कोई विरोधी नहीं है, हमारे लिए दो ही श्रेणियां हैं - एक जो हमारे साथ हैं और दूसरे, जो साथ आने वाले हैं। यह एक छोटा, लेकिन असाधारण आचरण सूत्र है। अगर यह मान लिया जाए कि जो आज साथ नहीं हैं, वे कल साथ होंगे, तो कोई विरोधी या दुश्मन नहीं रह जाएगा।
भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि संघ का उद्देश्य किसी को दुश्मन बनाना नहीं है। बल्कि, वे उन लोगों को भी अपने साथ लाना चाहते हैं जो फिलहाल उनके साथ नहीं हैं। यह सोच संघ के विस्तार का एक महत्वपूर्ण कारण है। उनका मानना है कि अगर हम सबको साथ लेकर चलने की भावना रखेंगे, तो कोई भी हमारा विरोधी नहीं रहेगा। यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण है जो समाज में सद्भाव और एकता को बढ़ावा देता है।
संघ की शाखाओं में सभी का स्वागत है, चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों। संघ का मानना है कि भारत की संस्कृति सभी को अपनाती है। इसलिए, शाखाओं में किसी की पहचान उसकी जाति या धर्म से नहीं, बल्कि उसके भारतीय होने से होती है। यह विचार स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद जैसे महान विचारकों के विचारों से प्रेरित है, जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक एकता पर जोर दिया था।
भागवत ने 'हिंदू राष्ट्र' की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत हमेशा से एक सांस्कृतिक रूप से हिंदू राष्ट्र रहा है। इसे अलग से घोषित करने की आवश्यकता नहीं है। पश्चिमी देशों की तरह राष्ट्र की परिभाषा को लागू करने से समस्याएं पैदा होती हैं। भारतीय चिंतन में राष्ट्र एक जीवन जीने का तरीका है, एक दर्शन है। संघ यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भारत में सभी धर्मों और पंथों के लोगों को अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का पूरा अधिकार मिले। यह भारत की मूल भावना और हिंदुत्व के चरित्र के अनुरूप है।
संघ का मानना है कि सेकुलरिज्म का मतलब धर्मनिरपेक्षता नहीं, बल्कि सभी संप्रदायों के प्रति तटस्थता होना चाहिए। इसका अर्थ है कि सरकार या समाज किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेगा, बल्कि सभी के साथ समान व्यवहार करेगा। यह विचार भारत की विविधता और समावेशिता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
भागवत के इन विचारों से यह स्पष्ट होता है कि संघ समाज में एकता, सद्भाव और समावेशिता को बढ़ावा देना चाहता है। वे जाति, धर्म या किसी अन्य आधार पर भेदभाव को खत्म करने के पक्षधर हैं। उनका लक्ष्य एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जहाँ सभी लोग मिलकर रहें और देश के विकास में योगदान दें। यह शताब्दी अभियान संघ की इन सोचों को जन-जन तक पहुंचाने का एक प्रयास है।
संघ का यह दृष्टिकोण कि 'हमारा कोई विरोधी नहीं है, केवल वे हैं जो हमारे साथ हैं और वे हैं जो साथ आने वाले हैं', एक बहुत ही महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह दर्शाता है कि संघ किसी को भी अलग-थलग नहीं करना चाहता, बल्कि सभी को साथ लेकर चलना चाहता है। यह एक ऐसा आचरण सूत्र है जो समाज में सकारात्मकता और सहयोग को बढ़ावा दे सकता है। अगर इस विचार को अपनाया जाए, तो समाज में नफरत और दुश्मनी की जगह प्रेम और भाईचारा बढ़ सकता है।
भागवत ने यह भी बताया कि संघ में नेतृत्व का चयन योग्यता और समर्पण के आधार पर होता है, न कि किसी विशेष जाति या समुदाय से होने के आधार पर। यह संघ की समावेशी प्रकृति को दर्शाता है। संघ सभी को समान अवसर प्रदान करता है और योग्यता को महत्व देता है। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो किसी भी संगठन के विकास के लिए आवश्यक है।
अंततः, मोहन भागवत के ये विचार संघ की सोच को एक नई दिशा देते हैं। वे समाज में व्याप्त गलतफहमियों को दूर करने और एक सकारात्मक संवाद स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। यह शताब्दी अभियान संघ को आम लोगों के करीब लाने और उनकी चिंताओं को दूर करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।