अक्सर हम अपने आसपास के लोगों को देखते हैं, तो उनकी सफलता, संपन्नता और प्रसन्नता की अनजाने में अपने जीवन की तुलना उनसे करने लगते हैं। यही तुलना धीरे-धीरे ईर्ष्या का रूप ले लेती है। जब ईर्ष्या मन में घर कर लेती है, तो वह भीतर की शांति और संतोष को खा जाती है। परिणामस्वरूप, व्यक्ति अपने पास जो कुछ है, उसकी कद्र करना भूल जाता है।
आज अनेक विद्यार्थी ऐसे हैं जो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करते हैं। वे अपनी मेहनत से अपनी पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। यदि वे उन छात्रों से ईर्ष्या करने लगें, जिनके माता-पिता उन्हें विदेश भेज सकते हैं, तो वे न तो अपने लक्ष्य पर ध्यान दे पाएंगे और न ही आत्मनिर्भर बनने की खुशी महसूस कर सकेंगे। इसी प्रकार, कम वेतन पाने वाला एक कर्मचारी यदि अपने अधिक वेतन वाले सहपाठी से ईर्ष्या करे, तो उसकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। वहीं, यदि कोई दिव्यांग व्यक्ति सक्षम लोगों से तुलना करके निराश हो जाए, तो वह अपनी विशिष्ट प्रतिभाओं को पहचानने से वंचित रह जाएगा।
जब आप दूसरों से ईर्ष्या तो समझिए कि आप अपने भीतर से उसका गुणगान कर रहे हैं। प्रश्न यह है कि हम अपना गुणगान क्यों न करें, अपने गुणों को क्यों न पहचानें? जो विद्यार्थी पढ़ाई के साथ काम कर रहे हैं, उन्हें यह सोचकर अपने संघर्ष के लिए आभारी होना चाहिए, क्योंकि यही अनुभव उन्हें मजबूत और आत्मनिर्भर बनाता है। कम वेतन पाने वाला कर्मचारी भी परिश्रम और लगन से अपनी स्थिति सुधार सकता है। दिव्यांग व्यक्ति अपनी अन्य क्षमताओं को पहचानकर जीवन में नई ऊंचाइयां छू सकता है।
हर व्यक्ति अद्वितीय है। हर किसी के भीतर अपने सपनों को साकार करने की क्षमता है। यदि हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें और साथ ही जो मिला है उसमें संतोष रखना सीखें, तो जीवन में चमत्कार हो सकते हैं। सच यही है- अपने गुणों को गिनिए और जीवन को आनंद से भर दीजिए।



