मालपुए का आनंद

नवभारत टाइम्स

एक समय था जब परिवारवाद के खिलाफ जोरदार नारे लगते थे। लोग इसे समाज के लिए बुरा बताते थे। लेकिन कुछ चतुर लोग दूसरों को उपदेश देते और खुद अपने बच्चों को आगे बढ़ाते रहे। पार्टी कार्यकर्ता मेहनत करते रहे पर सत्ता का वारिस परिवार ही बनता रहा।

satire on nepotism and the joy of malpua sweet holi memories
एक समय था जब कुछ लोग 'परिवारवाद' शब्द सुनते ही भड़क जाते थे। वे गली-मोहल्लों में 'परिवारवाद का नाश हो' जैसे नारे लगाते और जनसभाओं में भाषण देते कि इससे समाज में सबको बराबरी का मौका नहीं मिलता। लोग उनकी बातों पर तालियां बजाते और उन्हें सच्चा इंसान मानते थे। लेकिन, इन नारों के पीछे कुछ चालाक लोग थे। वे दूसरों से परिवारवाद को बुरा बताते, पर खुद मौका मिलते ही अपने बेटे-बेटियों को आगे बढ़ाते। पार्टी के कार्यकर्ता जी जान से काम करते, लेकिन जब विरासत की बात आती, तो नेता अपने बच्चों को ही आगे कर देते। फिर तो यह आम बात हो गई कि अगर किसी का चाचा इंजीनियर है, तो उसकी ठेकेदारी चमकने लगती। अगर खानदान में कोई पंच बन जाता, तो उसके परिवार के दो-चार लोगों की वकालत चलने लगती। जिनके पास कॉलेज होते, उनके दामाद प्रोफेसर बन जाते। इसके बावजूद, कोई भी परिवारवाद को अच्छा नहीं कहता था। जिसे मौका मिलता, वह परिवारवाद के खिलाफ बोलता। यह स्थिति ऐसी हो गई थी, जैसे 'गरीब की लुगाई' हो, जिसे कोई भी छेड़ देता।

"अरे, सुबह-सुबह किसकी लुगाई-भौजाई कर रहे हो? होली का दिन है। दोपहर तक सोते ही रहना है क्या?" पत्नी की जानी-पहचानी तेज आवाज कानों में गूंजी। पत्नी की आवाज सुनते ही मेरी नींद उड़ गई और मेरे ज्ञान चक्षु भी खुल गए। मैंने मन ही मन परिवारवाद को खूब कोसा। इससे पहले कि ईरान और अमेरिका की तरह हमारे बीच भी अनबन हो जाए, मुझे याद आया कि मालपुए बनाने की जिम्मेदारी तो हर बार की तरह इस बार भी मेरी ही है। अगर मैंने मालपुए नहीं बनाए, तो पूरा परिवार कैसे आनंद लेगा? मैंने तुरंत पत्नी को 'हैप्पी होली' कहा और किचन की ओर लपक लिया।
यह कहानी हमें दिखाती है कि कैसे लोग दूसरों के लिए तो परिवारवाद को गलत बताते हैं, लेकिन खुद उसी रास्ते पर चलते हैं। यह एक तरह का दोहरा मापदंड है। जो लोग समाज में समानता की बात करते हैं, वे अक्सर अपने परिवार के सदस्यों को खास मौके दिलाने में पीछे नहीं रहते। यह सिर्फ राजनीति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि व्यापार, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में भी देखा जाता है। जहां परिवार के सदस्य होने का फायदा उठाकर लोग आगे बढ़ते हैं, भले ही वे योग्य हों या न हों।

परिवारवाद की वजह से योग्य लोगों को मौका नहीं मिल पाता। जब किसी पद पर या किसी काम में किसी की सिफारिश से नियुक्ति होती है, तो वहां काबिलियत को दरकिनार कर दिया जाता है। इससे समाज का नुकसान होता है। जो लोग मेहनत करके आगे बढ़ना चाहते हैं, उन्हें निराशा हाथ लगती है। यह एक ऐसी समस्या है जो सालों से चली आ रही है और जिस पर लोग अक्सर बातें तो करते हैं, लेकिन इसका समाधान ढूंढने में नाकाम रहते हैं।

लेखक ने होली के दिन मालपुए बनाने की बात कहकर इस गंभीर मुद्दे को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश किया है। यह दिखाता है कि कैसे रोजमर्रा की जिंदगी में भी हम परिवारवाद से जुड़े अनुभवों से गुजरते हैं। होली जैसे त्योहारों पर परिवार का एक साथ आना और खुशियां मनाना, परिवारवाद के सकारात्मक पहलू को भी दर्शाता है, लेकिन जब यह स्वार्थ और पक्षपात का रूप ले लेता है, तो यह समाज के लिए हानिकारक हो जाता है।

यह लेख हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम वाकई परिवारवाद के खिलाफ हैं या सिर्फ कहने के लिए हैं? क्या हम खुद भी अनजाने में परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं? इन सवालों के जवाब ढूंढना हम सबके लिए जरूरी है, ताकि एक ऐसा समाज बन सके जहां सबको बराबरी का मौका मिले और काबिलियत को ही महत्व दिया जाए।