बोधा की रोटी

नवभारत टाइम्स

लाहौर जेल में भगत सिंह ने बोधा नामक सफाई कर्मचारी को बहुत सम्मान दिया। उन्होंने बोधा को 'बेबे' कहकर बुलाया और जाति-पांति के भेदभाव को गलत बताया। भगत सिंह ने कहा कि बोधा का काम उनकी मां से भी ऊंचा है। फांसी से पहले उन्होंने बोधा के हाथों की रोटी खाने की इच्छा जताई।

बोधा की रोटी
लाहौर जेल में बंद महान क्रांतिकारी भगत सिंह ने छुआछूत और जातिगत भेदभाव के उस दौर में भी बोधा नाम के सफाई कर्मचारी को 'बेबे' कहकर पुकारते हुए गहरा सम्मान दिया। भगत सिंह ने बोधा को यह समझाते हुए कि उनका काम उनकी मां से भी ऊंचा है, मानवता की सबसे बड़ी शिक्षा दी और फांसी पर चढ़ने से पहले बोधा के हाथों की रोटी खाने की इच्छा जताकर सभी को भावुक कर दिया।

भगत सिंह का यह व्यवहार उस समय के समाज के लिए एक मिसाल था, जब जाति-पांति का भेद बहुत गहरा था। बोधा, जो एक सफाई कर्मचारी थे, अक्सर भगत सिंह से कहते थे कि वे निम्न कुल से हैं और भगत सिंह जैसे उच्च कुल के क्रांतिकारी का उन्हें इस तरह बुलाना ठीक नहीं है।
लेकिन भगत सिंह मुस्कुरा कर कहते थे, "मेरी मां तो मेरा मल-मूत्र बचपन में साफ करती थीं, लेकिन तुम तो बड़ों की गंदगी साफ करते हो। इस दृष्टि से तुम्हारा स्थान तो मेरी मां से भी ऊंचा हुआ न?" भगत सिंह ने बोधा का अंत तक सम्मान किया।

फांसी पर चढ़ने से ठीक पहले, भगत सिंह ने जेल प्रशासन से एक खास अनुरोध किया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें बोधा के हाथों से बनी हुई रोटी खिलाई जाए। यह सुनकर बोधा की आंखों से आंसू बह निकले थे।

इस तरह, भगत सिंह ने कम उम्र में ही देश के लिए अपना बलिदान तो दिया ही, साथ ही यह महत्वपूर्ण शिक्षा भी दी कि मानवता सबसे बड़ी है। उन्होंने सिखाया कि हमें जाति-पांति और धर्म के भेद से ऊपर उठकर काम करना चाहिए। भगत सिंह का यह कार्य आज भी हमें प्रेरणा देता है कि सभी इंसान बराबर हैं और हमें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए, चाहे उनका पेशा या पृष्ठभूमि कुछ भी हो।