सीरिया के इस शहर से कैसे छिन गया लोकतंत्र

नवभारत टाइम्स

सीरिया के मनबिज शहर की कहानी। आम लोगों ने लोकतंत्र की कोशिश की। सुरक्षाबल भागे, लोगों ने शहर चलाया। अदालतें, क्लिनिक सब संभाले। गणतंत्र पनपा, पर बाहरी ताकतों और अंदरूनी झगड़ों से बिखर गया। आईएसआईएस और चरमपंथियों ने शहर पर कब्जा किया। अंत में बशर अल असद की सरकार फिर काबिज हुई।

how democracy was lost in syrias manbij city a decade of dictatorship rebellion and civil war

मृत्युंजय राय

आनंद गोपाल की ‘Days of Love and Rage: A Story of Ordinary People Forging a Revolution’ ऐसी किताब है, जो आपको अंदर से हिला देगी। इसमें सीरियाई क्रांति के बारे में लिखा गया है। आनंद ने इस क्रांति को मानवीय संवेदना के साथ पेश किया है। क्रांति की इस कहानी को पेश करने के लिए आनंद ने सीरिया के शहर मनबिज को चुना है। यह पूरा किस्सा उन्होंने इसी शहर को केंद्र में रखकर पेश किया है। एक दशक के दौरान इस शहर ने तानाशाही, विद्रोह और गृह युद्ध सब देखा। आनंद बताते हैं कि जब यहां के आम लोगों ने भले ही कम वक्त के लिए शहर में लोकतंत्र की घोषणा की तो उसके बाद क्या हुआ। वह लिखते हैं कि किस तरह से शहर युद्ध, अलगाववाद और गैर-बराबरी का गवाह बना।

मनबिज सीरिया के उत्तर में स्थित एक शहर है। यहां ज्यादातर मजदूर वर्ग और मध्यवर्गीय लोग रहते हैं। शिक्षकों, ऐथलीटों और एक्टिविस्टों की अच्छी संख्या है। और इन्हीं लोगों ने बशर अल असद की हुकूमत के खिलाफ एक स्थानीय विद्रोह को इस कदर बड़ा बना दिया कि असद के हाथ से सत्ता जाती हुई दिखने लगी।

यह कहानी शुरू होती है 2010 के दशक के शुरुआती वर्षों से । तब मनबिज में लोगों के सड़कों पर उतरने और सरकारी आदेशों को ताक पर रखने से एक विद्रोह पनपता है। इसकी वजह से सुरक्षाबल को शहर से बाहर भागना पड़ता है। पूरा सरकारी अमला जब किसी काम का न रहे तो स्थानीय लोग शहर को चलाने की जिम्मेदारी अपने हाथों में लेते हैं। अदालतों, क्लिनिकों और निकायों का दायित्व उनके कंधों पर होता है। इन हालात में शहर में गणतंत्र पनपता है। यहां अस्थायी अदालतें लगती हैं। स्थानीय मीडिया लोकतांत्रिक मूल्यों पर चलता है। आर्ट फेस्टिवल होते हैं। लेकिन कुछ समय बाद ही बाहरी ताकतों और अंदरूनी संघर्षों की वजह से गणतंत्र बिखरने लगता है।

आनंद गोपाल की इस किताब में किसी उपन्यास सरीखे किरदार हैं। इसमें एक कवि के बारे में लिखा गया है, जो अशद की सत्ता के खिलाफ विद्रोह में शामिल होते हैं। दो दोस्तों का किस्सा भी है, जिन्हें इस्लामिक राजनीति ने तोड़ रखा है। एक मां भी है, जो पितृसत्तात्मक नियमों को ताक पर रखती है। यहां एक मजदूर भी है, जो बराबरी के समाज के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है।

आनंद गोपाल पहले मनबिज में लोगों की सत्ता स्थापित होने और उससे पनपे जोश को सामने रखते हैं। कैसे लोग पहले वहां खुफिया पुलिस के दफ्तरों पर धावा बोलते हैं। फिर आजाद मीडिया पनपता है। लोगों में यह भाव पनपता है कि मनबिज की सत्ता उनकी अपनी है। उन्हें ही इसका संचालन करना है। लेकिन यह सब छलावा साबित होता है। जल्द ही धोखेबाजी इस विद्रोह को कमजोर करने लगती है। आपसी झगड़े शुरू हो जाते हैं। आखिर में इस्लामिस्टों के दमन का सामना शहरवासियों को करना पड़ता है। जब ISIS और दूसरे चरमपंथी संगठन शहर में दाखिल होते हैं तो पुरानी दोस्ती टूटने लगती है। शहर के कुछ बाशिंदे आतंकवादी संगठनों के मूल्यों को अपना लेते हैं और अपने ही लोगों के खिलाफ हो जाते हैं। आनंद गोपाल बताते हैं कि मनबिज में ऐसे लोग भी सामने आते हैं जो नई व्यवस्था को अंदर से कमजोर करने लगते हैं।

कुछ समय बाद अशद सरकार यहां अपनी सत्ता फिर से कायम कर लेती है। तब मनबिज के लोगों को अहसास होता है कि सिर्फ तानाशाह को उखाड़ फेंकने से ही आजादी हासिल नहीं हो जाती। तानाशाही खत्म होने के बाद नया अभिजात्य वर्ग अक्सर पुराने भ्रष्ट तरीकों और संस्थानों पर काबिज हो जाता है और वह उन्हें बनाए रखता है।