Menstrual Leave Not A Solution Need To Improve Work Environment
छुट्टियां समाधान नहीं, कामकाज केमाहौल को बेहतर बनाने की ज़रूरत
नवभारत टाइम्स•
सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश पर कहा कि यह नीतिगत मामला है। कोर्ट ने चिंता जताई कि अनिवार्य अवकाश से महिलाओं के करियर पर असर पड़ सकता है। ओडिशा, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों की स्वैच्छिक पहल की सराहना की गई। असली समाधान सिर्फ छुट्टी देना नहीं, बल्कि प्रजनन स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना और सुरक्षित माहौल बनाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश ( menstrual leave ) को लेकर दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह मामला सरकार की नीति से जुड़ा है और कोर्ट इसमें सीधे दखल नहीं देगा। कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि अगर पीरियड्स लीव को कानून बनाकर अनिवार्य कर दिया गया, तो इससे महिलाओं के करियर पर बुरा असर पड़ सकता है, उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां मिलने में दिक्कत हो सकती है और न्यायिक सेवाओं में भी भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों की 'स्वैच्छिक' पहल की सराहना की, जहां सरकारी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में छात्राओं को हर साल 60 दिनों तक का अवकाश दिया जाता है और निजी संस्थानों को भी इसके लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हालांकि, लेख में यह भी बताया गया है कि मासिक धर्म अवकाश के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं और पूरी तरह सही नहीं होते। यह नीति महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकारों के लिए सकारात्मक मानी जा रही है, लेकिन इसके पीछे के तर्क और इसके वास्तविक प्रभाव पर सवाल उठाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए साफ कर दिया कि यह मामला सीधे तौर पर सरकार की नीति का हिस्सा है। इसलिए, कोर्ट इस मामले में कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं करेगा। सुनवाई के दौरान, अदालत ने एक महत्वपूर्ण चिंता भी जाहिर की। कोर्ट का मानना था कि अगर मासिक धर्म अवकाश को कानून बनाकर सभी के लिए अनिवार्य कर दिया जाए, तो इसका महिलाओं के करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में, उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां सौंपने में कंपनियां हिचकिचा सकती हैं। इतना ही नहीं, न्यायिक सेवाओं में भी महिलाओं के साथ भेदभाव होने की आशंका जताई गई।इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट ने कुछ राज्यों की पहलों की सराहना की। ओडिशा, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों ने इस मामले में 'स्वैच्छिक' कदम उठाए हैं। इन राज्यों के सरकारी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में छात्राओं को हर साल 60 दिनों तक का अवकाश दिया जाता है। इसके अलावा, निजी संस्थानों को भी ऐसी नीतियां अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हाल के वर्षों में, यह नीति काफी चर्चा में रही है और इसे महिलाओं के स्वास्थ्य और उनके अधिकारों के लिए एक सकारात्मक कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि, लेख में इस विचार के समर्थन में दिए जाने वाले तर्कों पर भी सवाल उठाए गए हैं। यह बताया गया है कि कई बार इन तर्कों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और वे पूरी तरह से सही नहीं होते। अक्सर यह कहा जाता है कि मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द, थकान और सफाई की जरूरत को देखते हुए छुट्टी मिलनी चाहिए। लेकिन, यहीं पर एक बड़ा सवाल उठता है। अगर हम मासिक धर्म को एक सामान्य जैविक प्रक्रिया मानते हैं, तो इसके लिए अनिवार्य छुट्टी क्यों दी जानी चाहिए? और अगर दर्द इतना ज्यादा है कि आराम करना जरूरी हो जाता है, तो इसे सामान्य मानने के बजाय डॉक्टरी जांच करवाना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स (American College of Obstetricians and Gynecologists) के अनुसार, बहुत ज्यादा या असामान्य मासिक धर्म दर्द को सामान्य नहीं माना जाना चाहिए। यह किसी अंदरूनी स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है, इसलिए ऐसे मामलों में डॉक्टरों से सलाह लेना बहुत जरूरी है। इससे यह बात साफ हो जाती है कि सिर्फ छुट्टी देना ही समाधान नहीं है, बल्कि समस्या की जड़ तक पहुंचकर उसका इलाज करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
जूलियट हसार्ड (Juliet Hassard) और डॉ. लुईस डी. टोरेस (Dr. Louise D. Torres) की किताब ‘Aligning Perspectives in Gender Mainstreaming’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, पीरियड्स लीव जैसी नीतियां कभी-कभी कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति भेदभाव को दर्शाती हैं और कई बार अनजाने में इसे बढ़ा भी देती हैं। ऐसी लिंग-आधारित नीतियां इस धारणा को मजबूत कर सकती हैं कि सभी महिलाएं पुरुषों की तुलना में कमजोर होती हैं, कम भरोसेमंद होती हैं या फिर वे ज्यादा महंगी कर्मचारी साबित होती हैं।
‘मेनस्ट्रुअल मैटर्स’ (Menstrual Matters) वेबसाइट की संस्थापक सैली किंग (Sally King) के अनुसार, दुनिया भर में लागू मासिक धर्म अवकाश की नीतियां न तो महिलाओं के स्वास्थ्य में कोई खास सुधार ला पाई हैं और न ही लैंगिक समानता को मजबूत कर पाई हैं। इसके समर्थक यह दावा करते हैं कि इससे महिलाओं की सेहत बेहतर होगी, मासिक धर्म से जुड़ी शर्मिंदगी कम होगी और सामाजिक कलंक में कमी आएगी। साथ ही, लैंगिक समानता को भी बढ़ावा मिलेगा। लेकिन, यह स्पष्ट रूप से कभी नहीं बताया गया कि यह नीति इन लक्ष्यों को वास्तव में कैसे पूरा करेगी।
सैली किंग आगे कहती हैं, "अब तक के अनुभव बताते हैं कि यह जरूरी नहीं है कि मासिक धर्म अवकाश अपने बताए गए लक्ष्यों को सच में पूरा कर पाए।" जुली ए. नेल्सन (Juli E. Nelson) ने अर्थशास्त्र के पारंपरिक मॉडलों में नारीवादी सिद्धांतों पर काफी काम किया है। उनकी स्टडी 'The Power of Stereotyping and Confirmation Bias to Overwhelm Accurate Assessment' में यह बताया गया है कि महिलाओं को लेकर समाज की कई धारणाएं असल तथ्यों पर आधारित नहीं होतीं, बल्कि वे पुराने पूर्वाग्रहों पर टिकी होती हैं। यही कारण है कि कई बार नीतियां भी इन्हीं धारणाओं के प्रभाव में बनती हैं और बराबरी के असली लक्ष्य को कमजोर कर देती हैं।
कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि मौजूदा मासिक धर्म अवकाश की नीतियां अक्सर अपने निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने में असफल रहती हैं और कई बार तो ये कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति भेदभाव को और बढ़ा देती हैं। इसलिए, असली समाधान सिर्फ छुट्टी देने में नहीं है। इससे कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि दफ्तरों में प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर खुलकर बातचीत हो। लोगों में सही जानकारी और जागरूकता फैलाई जाए। और जरूरत पड़ने पर महिलाओं को समय पर सही इलाज और आवश्यक सहूलियतें मिल सकें।
इसके साथ ही, काम करने के तरीकों को थोड़ा लचीला बनाने की जरूरत है, ताकि हर कर्मचारी के हितों का ध्यान रखा जा सके। छुट्टी देना एक आसान तरीका लग सकता है, लेकिन हमें सिर्फ आसान दिखने वाली नीतियों पर ही नहीं रुकना चाहिए। बल्कि, ऐसे व्यावहारिक और समझदारी भरे कदम उठाने चाहिए जो बिना किसी भेदभाव के सभी कर्मचारियों के लिए एक सुरक्षित, सहज और बेहतर काम का माहौल तैयार करें। यह सुनिश्चित करेगा कि सभी को समान अवसर मिलें और किसी को भी अपनी जैविक प्रक्रियाओं के कारण पीछे न रहना पड़े।