परीक्षा की ‘परीक्षा’

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मई का महीना परीक्षाओं का मौसम बन गया है। बाहर गर्मी और अंदर रिजल्ट का डर लोगों को सताता है। स्कूल से लेकर दफ्तर तक, हर जगह परीक्षा का माहौल है। यह व्यवस्था ज्ञान की बजाय डर पर आधारित है। पर्चे लीक होते हैं और मूल्यांकन में निष्पक्षता की कमी है।

exam season test of knowledge or fear questions on the system

मई महीना नहीं मानक है जो मूल्यांकन के लिए ही बना है। बाहर सूरज तपिश से शरीर की परीक्षा लेता है, अंदर रिजल्ट का डर आत्मा की। स्कूल से दफ्तर तक एक ही मौसम चलता है, परीक्षा। जैसे प्रकृति ने तय कर दिया हो कि इसी महीने सारा हिसाब-किताब होना चाहिए।

सुधर्मा ने तो सुझाव दे डाला कि मई का नाम बदलकर ‘परीक्षा मास’ रख दो। एसी की ठंडक और बिल की गर्मी के बीच संतुलन साधते सुखनंदन बोले, ‘प्रिये! परीक्षा हमारे समाज, संस्कार, जीवन का यूं हिस्सा है जैसे धमनियों में रक्त। बच्चे के शब्द ने जहां अर्थ लिया, उसकी परीक्षा शुरू। रिश्तेदार आते ही सवालों का सिलेबस खुल जाता है। टेस्ट तो यूं शुरू हो जाता है जैसे ‘परीक्षक’ का जन्म ही इसी पल पर हुआ है, भले ही उसकी अपनी मार्कशीट पर आज भी कृपांक की छाया है।’

सुधर्मा ने तर्क दिया, ‘परीक्षा तो जरूरी है, तभी तो गुणवत्ता बनेगी।’ सुखनंदन ने पलटकर पूछा, ‘गुणवत्ता किसकी- ज्ञान की या डर की? अब लड़ाई 99 और 100 की नहीं, A और A+ की है। समझ कहां है, पर रैंकिंग चमक रही है। बच्चे सीख कम रहे हैं, साबित ज्यादा कर रहे हैं। शिक्षा का कारोबार उतना ही तेज है, जितना रिजल्ट का विज्ञापन।’ सुखनंदन बोले, ‘असली परीक्षा तो तब है, जब परीक्षा खुद पास हो। पर्चे ऐसे लीक होते हैं, जैसे गली का नल, फिर भी व्यवस्था सूखी कहलाती है। जो परीक्षा तय हो, वह होती कम और दोहराई ज्यादा जाती है। अगर किसी तरह हो भी गई तो मूल्यांकन नया संग्राम है। यहां उत्तर से ज्यादा महत्व परीक्षक के मिजाज का होता है। मशीन जांचे तो भावनाएं गायब, इंसान जांचे तो निष्पक्षता गायब।’

सुधर्मा ने आखिरी सवाल दागा, ‘जवाबदेही कहां है?’ सुखनंदन ने गहरी सांस ली, ‘जवाबदेही सिलेबस में है पर पढ़ाया नहीं जाता। हर गड़बड़ी का एक स्थायी आरोपी है- व्यवस्था से बाहर खड़ा कोई अदृश्य पात्र। इसलिए परीक्षा चलती रहती है, पर उसकी ‘परीक्षा’ आज तक बाकी है।’