स्वाभिमान नहीं छोड़ा

नवभारतटाइम्स.कॉम•
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चंद्रशेखर आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी स्वाभिमानी, स्पष्टवादी और अपने सिद्धांतों के प्रति अत्यंत दृढ़ थे। वह न स्वयं अन्याय सहन करते और न किसी दूसरे पर अन्याय होते हुए देख सकते थे। भाबरा में रहते हुए उनके पिता को एक सरकारी बगीचे में चौकीदार का काम मिला। आर्थिक स्थिति साधारण थी, फिर भी उन्होंने बगीचे के एक फल को भी बिना अनुमति तोड़ना उचित नहीं समझा। एक बार तहसीलदार ने बिना पैसे फल तुड़वाने चाहे तो उन्होंने विरोध किया। बात इतनी बढ़ी कि उन्होंने नौकरी छोड़ना उचित समझा। एक बार उनकी पत्नी पड़ोसी के घर से नमक मांगकर लाईं। यह बात उन्हें पसंद नहीं आई। उन्होंने पत्नी को समझाया कि आवश्यकता होने पर भी दूसरों से मांगकर जीवन चलाना उचित नहीं। इस अनुशासन के पालन के लिए परिवार ने कुछ दिनों तक बिना नमक का भोजन किया। ऐसी ही छोटी-छोटी घटनाएं बालक चंद्रशेखर के व्यक्तित्व की नींव बन रही थीं। उन्होंने अपने पिता से सीखा कि गरीबी कोई अपराध नहीं, लेकिन बेईमानी अवश्य चरित्र को कमजोर करती है। अभाव कोई शर्म की बात नहीं, पर आत्मसम्मान बेच देना सबसे बड़ा पतन है।

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