शिक्षकों की जगह नहीं ले सकता AI एल्गोरिद्म

नवभारतटाइम्स.कॉम•
ai cannot replace teachers but can become an assistant national education policy
1980 के दशक के मध्य की बात है। जब मैं कॉलेज का छात्र था, तब भारत में कंप्यूटर नए-नए आ रहे थे। उस दौर में चारों तरफ गहरी आशंका थी कि एक अकेला कंप्यूटर 20-20 लोगों का रोजगार छीन लेगा। हम भी उन चिंताओं से घिरे थे। छात्र होने के नाते सड़कों पर उतरे, विरोध किया और इसी भय में रहे कि यह तकनीक नौकरियां खत्म कर देगी।

लेकिन, समय के साथ हमने इतिहास बदलते देखा। कंप्यूटर ने नौकरियां छीनी नहीं, रोजगार के अनगिनत नए रास्ते खोले और 'डेटा विश्लेषण' एक बिग साइंस के रूप में स्थापित हुआ। आज चार दशक बाद हम इतिहास के ठीक वैसे ही मोड़ पर खड़े हैं। इस बार कंप्यूटर की जगह कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI ने ले ली है।
AI हमारे दैनिक जीवन और कार्य संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है। सुबह के अलार्म, वॉइस असिस्टेंट, सोशल मीडिया, जीपीएस और भाषा अनुवाद से लेकर चिकित्सा, वित्त, प्रशासन और शोध तक में इसका इस्तेमाल हो रहा है। डिजिटल युग में पली-बढ़ी नई पीढ़ी के सोचने, संवाद करने और सीखने के तरीके भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। जब तकनीक जीवन के हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, तो अध्यापक शिक्षा में इसका समावेश भी स्वाभाविक और जरूरी है। अब हमारा साझा संकल्प यह होना चाहिए कि हम इसका उपयोग कितना मूल्य-आधारित, नैतिक और प्रभावी बनाते हैं।

तकनीक सहायक है, स्वामी नहीं

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) स्पष्ट रेखांकित करती है कि कोई भी शिक्षा प्रणाली अपने शिक्षकों के स्तर से ऊपर नहीं उठ सकती। तकनीक और शिक्षा का संबंध द्विमार्गी है। तकनीक को शिक्षणशास्त्र का सहायक होना चाहिए, न कि उसका संचालक। हमारा दृष्टिकोण कभी भी 'डिजिटल फर्स्ट' नहीं, हमेशा 'लर्नर फर्स्ट' रहना चाहिए। तकनीक एक सशक्त सेवक हो सकती है, लेकिन कभी शिक्षक का स्थान नहीं ले सकती। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रेखांकित किया है- हम उस युग में प्रवेश कर रहे हैं जहां मानव और बौद्धिक प्रणालियां मिलकर सह-सृजन, सह-कार्य और सह-विकास कर रही हैं। शिक्षक का मानवीय स्पर्श, बच्चे को दिया गया अपनत्व, नैतिक संस्कार और उसकी आंखों में छिपी जिज्ञासा को समझना - यह कोई भी मशीन या एल्गोरिद्म कभी नहीं कर सकता।

अक्सर यह भ्रम रहता है कि AI केवल महानगरों और चुनिंदा आधुनिक विद्यालय का साधन है। किंतु एक नीति निर्माता और शिक्षक-प्रशिक्षक के रूप में मेरा दृढ़ विश्वास है कि AI की सबसे बड़ी शक्ति हमारे ग्रामीण और सुदूर परिवेश में सिद्ध होगी। कल्पना कीजिए किसी दूरस्थ प्राथमिक विद्यालय की, जहां एक ही कक्षा में अलग-अलग बौद्धिक स्तर के 40-50 बच्चे हैं। अकेले शिक्षक के लिए हर बच्चे की जरूरत पर ध्यान देना बड़ी चुनौती है। AI यहां मदद कर सकती है। 'भाषिणी' और भारतीय भाषा मॉडल्स के जरिए शिक्षक विज्ञान और गणित की जटिल अवधारणाओं को स्थानीय बोली और खेती-किसानी जैसे रोजमर्रा के अनुभवों से जोड़कर सरल बना सकते हैं। AI सिमुलेशन और डिजिटल लाइब्रेरी से बच्चे प्रयोग कर सकते हैं और दुनिया भर के शैक्षिक संसाधनों तक पहुंच सकते हैं।

डेटा की सुरक्षा प्राथमिकता

तकनीक की शक्ति बढ़ने के साथ नैतिकता की कसौटी भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। विद्यार्थियों के डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारी प्राथमिकता है। साहित्यिक चोरी और बिना सोचे-समझे उत्तर कॉपी-पेस्ट करने की प्रवृत्ति विद्यार्थियों की मौलिक व विश्लेषणात्मक चिंतन क्षमता को खत्म कर सकती है। भावी शिक्षकों को सिखाना होगा कि AI का उपयोग रेडीमेड उत्तर पाने के बजाय विद्यार्थियों की मौलिक सोच, संवाद और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए कैसे करें।

अध्यापक शिक्षा राष्ट्र निर्माण का आधार है और एक आत्मनिर्भर भारत गढ़ने की जीवंत कार्यशाला। जब देश 2047 तक 'विकसित भारत' के संकल्प को साकार करने की ओर बढ़ रहा है, तब समर्थ शिक्षक ही इसका सबसे मजबूत आधार बनेंगे। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) इसी दिशा में चार-वर्षीय इंटीग्रेटेड टीचर एजुकेशन प्रोग्राम (ITEP), नैशनल मिशन फॉर मेंटरिंग (NMM) और नैशनल प्रफेशनल स्टैंडर्ड्स फॉर टीचर्स (NPST) के माध्यम से तकनीक-सक्षम, मूल्य-आधारित और भविष्योन्मुखी शिक्षक तैयार करने के लिए निरंतर सेवारत है।

तकनीक के मानवीय और संवेदनशील चेहरे को पहचानते हुए शिक्षक की केंद्रीय भूमिका को सर्वोपरि रखना ही हमारी शक्ति है। तकनीक को अपने नियंत्रण में रखकर, उसका विवेकपूर्ण और नैतिक उपयोग करने वाला शिक्षक ही नए भारत का मार्ग प्रशस्त करेगा

(राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद के अध्यक्ष)

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