लेखक समझदार हैं। उन्हें लगभग सारे सरकारी पुरस्कार मिल चुके हैं। सरकारी खर्चे पर देश-विदेश की यात्राएं भी कर चुके हैं। सरकार किसी भी विचारधारा की हो, लेखक उसके पसंदीदा बन जाते। रोज शाम को सम्मान और विमोचन समारोह में दिखते, और उसके थोड़ी देर बाद सोशल मीडिया पर।
एक रोज प्रदर्शनकारियों के नेता ने लेखक को फोन किया, 'आप हमारे धरने पर आइए। हमने आपके उपन्यास से ही प्रेरणा लेकर संघर्ष शुरू किया है।' लेखक थोड़ा अचकचाए, फिर पूछा, 'धरना किस मुद्दे पर है?' 'स्कूली किताबों में बदलाव को लेकर।' अगले दिन लेखक धरना स्थल पर पहुंचे और भाषण देना शुरू किया, 'दोस्तो, बदलाव तो प्रकृति का नियम है। रुका हुआ पानी भी एक समय बाद सड़ने लगता है।' प्रदर्शनकारियों को लगा कि दांव उल्टा पड़ रहा है। उनके नेता ने मोबाइल पर विडियो दिखाते हुए कहा, 'कुछ रोज पहले तो आपने कहा था कि इतिहास अच्छा हो या बुरा, उसे बदला नहीं जा सकता।'लेखक मुस्कुराए और बोले, 'आपको क्या लगता है कि किताबें बदलने से इतिहास बदल जाएगा?' प्रदर्शनकारी गुस्सा गए, 'आप लेखक हैं या नेता?' 'आजकल तो हर नेता लेखक है। ऐसे में हमें भी थोड़ी नेतागीरी करनी पड़ रही है।' खैर, लेखक धरने से लौटे ही थे कि मंत्री जी का फोन आ गया। लेखक का हेलो सुनते ही वह बमक उठे, 'हमने आपको सबसे बड़ा पुरस्कार दिया। विदेश भेजा। आप धरने में चले गए।' लेखक ने कहा, 'इसीलिए तो धरने में गए थे। जानना चाहते थे कि कोई सरकार विरोधी गतिविधि तो नहीं चल रही।' उन्होंने मंत्री जी को प्रदर्शनकारियों की पूरी रणनीति समझाई। मंत्री ने पूछा, 'अगली विदेश यात्रा कब करनी है।' 'फिलहाल तो आप हो आइए। हम आंदोलन पर किताब लिखने के बाद जाएंगे।' मंत्री जी बुदबुदाए, 'असली नेता तो लेखक हैं।'