Women Of Mumbai The Citys Heartbeat The Homes Soul
महानगर की औरतें, औरतों का महानगर
नवभारतटाइम्स.कॉम•
वे जल्दबाजी में दफ्तर के लिए भागती हैं, उससे भी ज्यादा जल्दबाजी में दफ्तर से घर के लिए। घर या दफ्तर पहुंचने से पहले उन्हें बनानी पड़ती है ठसाठस भरी लोकल के डिब्बे या बस में दो पांव रखने के लिए थोड़ी सी जगह, ताकि शहर में भी बनी रहे उनकी थोड़ी सी जगह। तय डिब्बा, तय वक्त और बहुत हद तक तय सहयात्री उन्हें अहसास कराते हैं कि इस जन महासागर में थोड़ी सी हिस्सेदारी उनकी भी है। एक काम खत्म कर वे लौटती हैं दूसरे काम पर। साग-सब्जी, दूध-ब्रैड लेते हुए जब दाखिल होती हैं घर में, तो झट से संवारने लग जाती हैं बिखरे घर को, बच्चों को लगा लेती हैं सीने से, पतियों को देती हैं दफ्तर का अपडेट। 2011 की जनगणना के मुताबिक, मुंबई और उपनगरों में साढ़े 10 लाख कामकाजी महिलाएं थीं। आज अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनकी संख्या कितनी हो गई होगी।
गृहिणियों का महानगर । दिनभर ऊंची इमारतों में टंगे रहने के बाद शाम को वे उतरती हैं नीचे। छोटे-छोटे समूहों में बंटकर बनाती हैं अपना समाज। कई बार पत्नियों के कारण ही बिल्डिंग के पुरुष एक-दूसरे से परिचित होते हैं। बच्चों के कारण महिलाएं एक-दूसरे की मम्मियों को जानती हैं। कई ने कुर्बान किया होता है अपना करियर, अपनी पहचान। बच्चों की खातिर, सास-ससुर की खातिर। गांव-कस्बों की तरह यहां स्थायी पड़ोसी नहीं होते। किराएदार पड़ोसी के घर बदलते ही बदल जाता है पड़ोस। लेकिन मेल-जोल की प्रवृत्ति से महिलाएं जल्द बना लेती हैं नया पड़ोस।एक महानगर यह भी । इस महानगर के अंदर एक और महानगर है। वह महानगर बसा है छोटी-छोटी झुग्गियों से बनी एक बड़ी झुग्गी बस्ती से। यहां वे अपना ऐसा समाज बनाती हैं कि मेहमान के आने पर बर्तन, बिस्कुट और नमकीन तक लेने-देने में संकोच नहीं करतीं। यहां सबमें एक ही चीज कॉमन होती है, वह है गरीबी। ये औरतें भी कामकाजी होती हैं, लेकिन किसी जीडीपी में दर्ज नहीं होतीं। ये दफ्तर नहीं जातीं, घर को ही दफ्तर बना देती हैं। टांकती हैं कभी कमीज के बटन, बनाती हैं पापड़-अचार, पहुंचाती हैं कहीं समय से टिफिन।
कमाई में पुरुषों से पीछे नहीं । मुंबई पुरुष और औरत की कमाई के मामले में सबसे कम भेद रखने वाला शहर है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 कहता है कि भारत के बड़े शहरों में नियमित वेतनभोगी नौकरियों में महिला और पुरुषों के वेतन के बीच अंतर (जेंडर पे गैप) मुंबई में सबसे कम है। सर्वे के अनुसार, मुंबई में रेगुलर सैलरी वाली कामकाजी महिलाओं की औसत मासिक आय 35,788 रुपये है, जबकि पुरुषों की औसत मासिक आय 36,453 रुपये है। यानी दोनों के वेतन में सिर्फ 2% का ही अंतर है। लेकिन इस मामूली अंतर के बावजूद भी उन्हें नहीं मिलती घरेलू के कामों से वैसी मुक्ति, जैसी पुरुषों को मिलती है।