एफसीआई जनरल मैनेजर आईके चौधरी ने भारत-विरोधी वीडियो मामले में सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया

NewsPoint
Navbharat Times
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के जनरल मैनेजर आईके चौधरी ने एक कर्मचारी के कथित भारत-विरोधी वीडियो पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि वीडियो की पूरी जांच होगी और अगर वह कर्मचारी का निकला तो उसे नौकरी से निकाला जा सकता है। चौधरी ने जोर देकर कहा कि कर्मचारी की पहचान, जाति या धर्म नहीं, बल्कि देश और सरकार की योजनाओं के प्रति उसकी निष्ठा मायने रखती है। उन्होंने पीडीएस के तहत खराब गुणवत्ता वाले गेहूं की आपूर्ति की शिकायतों पर भी जांच का आश्वासन दिया और कहा कि एफसीआई अपने गोदामों में गुणवत्ता की जांच के लिए मीडिया को आमंत्रित करेगा।

एफसीआई के जनरल मैनेजर आईके चौधरी ने एक कर्मचारी के कथित तौर पर भारत-विरोधी वीडियो पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मामले की पूरी और निष्पक्ष जांच की जाएगी। यदि जांच में यह साबित हो जाता है कि वीडियो उसी कर्मचारी का है, तो उसके खिलाफ नौकरी से निकालने तक की सबसे कड़ी कार्रवाई की जाएगी। चौधरी ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी कर्मचारी के लिए उसकी जाति या धर्म महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि देश और सरकार की योजनाओं के प्रति उसकी प्रतिबद्धता सबसे ज्यादा मायने रखती है।
चौधरी ने बताया कि उन्हें मीडिया के माध्यम से कुछ वीडियो मिले हैं। उन्होंने कहा कि अगर वीडियो में दिखाई देने वाली महिला कर्मचारी वही हैं और वीडियो में सुनाई दे रही आवाज भी उन्हीं की है, तो यह एक बहुत ही गंभीर और चिंताजनक मामला है। उन्होंने आश्वासन दिया कि अगले ही दिन संबंधित कर्मचारी को एक शो-कॉज नोटिस जारी किया जाएगा। इस नोटिस के जरिए कर्मचारी से जवाब मांगा जाएगा। इसके बाद पूरे मामले की विभागीय जांच शुरू की जाएगी।

उन्होंने आगे कहा कि जांच में यदि यह पक्का हो जाता है कि वीडियो उसी कर्मचारी का है और उसमें आपत्तिजनक या भारत-विरोधी बातें कही गई हैं, तो नियमों के तहत सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी साफ किया कि यह कार्रवाई कर्मचारी की पहचान, जाति या धर्म के आधार पर नहीं होगी, बल्कि उसके आचरण और नियमों के उल्लंघन के आधार पर की जाएगी।

आईके चौधरी ने एफसीआई कर्मचारियों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि निगम के कर्मचारी देश के अलग-अलग हिस्सों में खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि एफसीआई कर्मचारी किसी भी जाति या धर्म के हों, वे देश के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। वे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) और भारत सरकार की अन्य योजनाओं को सही तरीके से लोगों तक पहुंचाने के लिए काम कर रहे हैं।

अनंतनाग का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां की कठिन परिस्थितियों में भी एफसीआई कर्मचारी खाद्यान्न की आपूर्ति सुनिश्चित कर रहे हैं। उनके अनुसार, अनंतनाग में रेलवे के माध्यम से प्रतिदिन खाद्यान्न पहुंच रहा है और एफसीआई का स्टाफ उसे उतारने और आगे की व्यवस्था करने में जुटा हुआ है। ऐसे महत्वपूर्ण काम के लिए कर्मचारियों के समर्पण की आवश्यकता होती है और उनका स्टाफ इस जिम्मेदारी को बखूबी निभा रहा है।

पीडीएस के जरिए कथित तौर पर खराब गुणवत्ता का गेहूं सप्लाई किए जाने की शिकायत पर भी आईके चौधरी ने जांच की पुष्टि की। उन्होंने गेहूं और अन्य अनाज में मौजूद फैट कंटेंट (वसा की मात्रा) और नमी के बीच होने वाली प्रक्रिया का जिक्र करते हुए बताया कि सामान्य तौर पर गेहूं में लगभग 12 से 13.5 प्रतिशत तक नमी हो सकती है। यदि अनाज अधिक नमी सोख लेता है और इसके साथ गर्मी तथा हवा का संपर्क होता है, तो उसके अंदर खराब होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप कई बार आटे में कड़वाहट आने की संभावना रहती है। उन्होंने बताया कि जुलाई-अगस्त के दौरान पहाड़ी क्षेत्रों में नमी काफी अधिक रहती है। ऐसे में गेहूं को स्टोर करने, पीसने और पीसे हुए आटे को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है।

आईके चौधरी ने बताया कि आटे में कड़वाहट आने के कई संभावित कारण हो सकते हैं। उन्होंने मुख्य रूप से चूहों से होने वाली समस्या, अल्फाटॉक्सिन (एक प्रकार का फफूंद विष) और नमी, फैट कंटेंट, गर्मी तथा हवा के संपर्क से होने वाली प्रक्रिया का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चूहों से जुड़ी समस्या आजकल पीडीएस दुकानों में भी काफी कम देखने को मिलती है। वहीं, अल्फाटॉक्सिन की बात करते हुए उन्होंने कहा कि जिस सैंपल का जिक्र किया गया है, उसमें भी उन्हें अल्फाटॉक्सिन की मौजूदगी नहीं मिली है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिस सैंपल की बात हो रही है, वह उनका संयुक्त रूप से लिया गया सैंपल नहीं था, इसलिए वे उसे अपना सैंपल नहीं मानते।

खराब गेहूं और कड़वे आटे की शिकायत पर उन्होंने मीडिया को अपने गोदाम में आकर गुणवत्ता की जांच करने का खुला प्रस्ताव दिया। उन्होंने कहा कि यदि पत्रकार चाहें तो उनके सामने गोदाम से गेहूं निकाला जाएगा, उसे पीसा जाएगा और उसी से रोटियां बनाकर वे खुद भी खाएंगे और पत्रकार भी खा सकते हैं। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि गोदाम में मौजूद गेहूं की वास्तविक गुणवत्ता क्या है और उससे तैयार आटा कड़वा है या नहीं। चौधरी ने साफ शब्दों में कहा कि वह इस आरोप को स्वीकार नहीं करते कि कड़वा आटा एफसीआई की वजह से मिल रहा है।

गेहूं की गुणवत्ता से जुड़े भौतिक मानकों को लेकर उन्होंने कहा कि यदि किसी बोरे में लकड़ी के टुकड़े, खरपतवार के बीज या मिट्टी जैसे भौतिक पदार्थ अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, तो उन्हें सीधे मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त घोषित करने के बजाय निर्धारित प्रक्रिया के तहत साल्वेजिंग (सुधार) की जाती है। इसके लिए एफसीआई डिपो में अतिरिक्त श्रमिकों की व्यवस्था की जाती है। गेहूं को खोलकर साफ किया जाता है और पंखे आदि की मदद से अनचाही सामग्री को अलग किया जाता है। उन्होंने कहा कि लकड़ी के टुकड़े, मिट्टी या अन्य भौतिक अशुद्धियों को हटाने की प्रक्रिया पहले भी घरों में अपनाई जाती रही है, जब लोग चक्की में गेहूं पिसवाने से पहले उसे साफ करते थे। गुणवत्ता जांच में केमिकल (रासायनिक) और फिजिकल (भौतिक) पैरामीटर दोनों महत्वपूर्ण होते हैं और फिजिकल अशुद्धियों को निर्धारित प्रक्रिया के जरिए हटाया जाता है।

आईके चौधरी ने कहा कि एफसीआई अपने डिपो से गेहूं जारी करते समय उसकी गुणवत्ता को लेकर निर्धारित मानकों का पालन करता है। यदि किसी स्तर पर गुणवत्ता को लेकर शिकायत आती है तो उसकी जांच जरूरी है और संबंधित प्रक्रिया को देखा जाना चाहिए। गेहूं की गुणवत्ता का आकलन केवल एक शिकायत या वीडियो के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए सैंपलिंग (नमूना लेना), जांच और पूरी प्रक्रिया को देखना जरूरी है।

रेकमेंडेड खबरें