इंदिरा गांधी नहर परियोजना: पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा, सिंचाई और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका
इंदिरा गांधी नहर परियोजना: पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा, सिंचाई और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका
NewsPoint•
राजस्थान की पश्चिमी जीवनरेखा, इंदिरा गांधी नहर परियोजना, राज्य के सूखे इलाकों में पानी पहुंचाकर सिंचाई, पेयजल और कृषि विकास में क्रांति लाई है। 1948 में बीकानेर के इंजीनियर कंवर सेन की परिकल्पना से शुरू हुई इस परियोजना ने पंजाब की नदियों के पानी को थार के रेगिस्तान तक पहुंचाया, जिससे लाखों हेक्टेयर भूमि सिंचित हुई और लाखों लोगों को पीने का पानी मिला। 31 मार्च 1958 को तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने इसका उद्घाटन किया था, और 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निधन के बाद इसका नाम बदलकर इंदिरा गांधी नहर परियोजना कर दिया गया। यह नहर आज भी राजस्थान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, भले ही इसमें रिसाव और लाइनिंग खराब होने जैसी समस्याएं आई हैं, जिनके समाधान के लिए आधुनिकीकरण की परियोजनाएं चल रही हैं।
यह विशाल परियोजना पश्चिमी राजस्थान के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इसे राज्य की सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजनाओं में गिना जाता है और पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा भी कहा जाता है। इस परियोजना ने थार के बड़े हिस्से में सिंचाई, पेयजल और कृषि विकास की संभावनाएं बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी शुरुआत 1948 में हुई थी, जब बीकानेर राज्य के इंजीनियर कंवर सेन ने पंजाब की नदियों के पानी को राजस्थान के शुष्क और रेगिस्तानी क्षेत्रों तक पहुंचाने का सपना देखा था। केंद्र सरकार के दस्तावेजों के अनुसार, परियोजना की पहली व्यवहार्यता रिपोर्ट 1951 में तैयार की गई थी। इसके बाद, परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए विस्तृत सर्वेक्षण और योजनाएं बनाई गईं। जनवरी 1955 में रावी और व्यास नदियों के अतिरिक्त जल के बंटवारे को लेकर एक समझौता हुआ। बाद में, 1981 में राजस्थान के हिस्से के पानी में वृद्धि की गई, जिससे परियोजना का दायरा और बढ़ गया।इंदिरा गांधी नहर का औपचारिक निर्माण कार्य 31 मार्च 1958 को शुरू हुआ। उस समय के केंद्रीय गृहमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने इस महत्वपूर्ण परियोजना का उद्घाटन किया था। यह नहर पंजाब के हरिके बैराज से पानी प्राप्त करती है। हरिके बैराज सतलुज और व्यास नदियों के संगम पर स्थित है। वहां से एक फीडर नहर के माध्यम से पानी राजस्थान तक पहुंचता है। फिर, मुख्य नहर और उसकी विभिन्न शाखाओं के जरिए यह पानी रेगिस्तानी इलाकों में फैलाया जाता है, जिससे वहां जीवन संभव हो पाता है।
शुरुआत में इस नहर का नाम राजस्थान नहर था। लेकिन, 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निधन के बाद, उनके सम्मान में इसका नाम बदलकर इंदिरा गांधी नहर परियोजना कर दिया गया। इसके बाद, परियोजना का विस्तार चरणबद्ध तरीके से किया गया। मुख्य नहर का निर्माण 1986 तक पूरा हो गया था, और नहर का पानी जैसलमेर के मोहनगढ़ तक पहुंच गया था। इस तरह, रेगिस्तान में खेती की तस्वीर पूरी तरह से बदल गई।
इंदिरा गांधी नहर का सबसे बड़ा और सबसे सकारात्मक प्रभाव पश्चिमी राजस्थान की कृषि पर पड़ा है। जिन इलाकों में खेती पूरी तरह से बारिश पर निर्भर थी, वहां अब सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने लगी है। श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर और जैसलमेर जैसे कई जिलों में कृषि गतिविधियों का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। किसानों को अब अपनी फसलों के लिए पानी की चिंता नहीं करनी पड़ती, जिससे उनकी आय में वृद्धि हुई है और जीवन स्तर सुधरा है।
इस परियोजना का उद्देश्य केवल खेतों तक पानी पहुंचाना ही नहीं था। इसके तहत कई अन्य महत्वपूर्ण लक्ष्य भी निर्धारित किए गए थे। इनमें पेयजल की आपूर्ति, औद्योगिक उपयोग के लिए पानी उपलब्ध कराना, सूखा प्रभावित क्षेत्रों को राहत पहुंचाना, रोजगार के अवसर पैदा करना और पर्यावरण में सुधार करना शामिल था। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी इस नहर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, परियोजना के कमांड क्षेत्र में करीब 19.63 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचित करने का लक्ष्य रखा गया था। बाद में, राज्य सरकार के निर्णय के अनुसार, लगभग 16.17 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिए नहर निर्माण कार्य पूरा किया गया। यह एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, जिसे इस नहर ने हरा-भरा बना दिया है।
आज भी इंदिरा गांधी नहर राजस्थान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह केवल सिंचाई का साधन नहीं है, बल्कि राजस्थान के कई शहरों और गांवों में इसका पानी पीने के लिए भी इस्तेमाल होता है। उदाहरण के तौर पर, राजस्थान के नागौर जिले के कई गांवों और कस्बों को इंदिरा गांधी नहर से पीने का पानी उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे लाखों लोगों की प्यास बुझती है और उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है।
हालांकि, समय के साथ नहरों में कुछ समस्याएं भी सामने आई हैं। नहरों से पानी का रिसाव और लाइनिंग (कच्ची नहरों के अंदर की परत) का खराब होना जैसी दिक्कतें आई हैं। इन समस्याओं के कारण पानी की बर्बादी होती है और सिंचाई दक्षता कम हो जाती है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए, पानी की बर्बादी को रोकने और सिंचाई दक्षता को बढ़ाने के लिए नहर प्रणाली के पुनर्वास और आधुनिकीकरण की परियोजनाएं भी चलाई जा रही हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य नहर प्रणाली को और अधिक मजबूत और कुशल बनाना है, ताकि भविष्य में भी यह परियोजना राजस्थान के लोगों के लिए जीवनदायिनी बनी रहे।