ईरान अमेरिका समझौता और मध्य पूर्व का नया समीकरण: अब्राहम समझौते में शामिल होंगे मुस्लिम देश?
ईरान-अमेरिका समझौता और मध्य पूर्व का नया समीकरण: अब्राहम समझौते में शामिल होंगे मुस्लिम देश?
NewsPoint•
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम हो रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप अब अरब देशों पर इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने का दबाव बना रहे हैं। ट्रंप चाहते हैं कि ये देश अब्राहम समझौते में शामिल हों। यह मध्य पूर्व में शांति की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने की कगार पर है, और दोनों देश एक समझौते के करीब हैं। इस बीच, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिम और अरब देशों पर इज़राइल के साथ अपने संबंधों को सामान्य करने का दबाव बढ़ा दिया है। ट्रंप ने सऊदी अरब, यूएई, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेताओं से फोन पर बात की और उन्हें 'अब्राहम समझौते' में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया। यह समझौता अरब देशों और इज़राइल के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के लिए है। ट्रंप का मानना है कि ईरान के साथ टकराव खत्म होने के बाद, अगला कदम यही होगा। हालांकि, ईरान और इज़राइल के बीच दशकों पुरानी दुश्मनी को देखते हुए, ईरान का इस समझौते में शामिल होना फिलहाल मुश्किल लग रहा है। ट्रंप के सहयोगी, जैसे सीनेटर लिंडसे ग्राहम, ने सऊदी अरब और अन्य देशों को चेतावनी दी है कि अगर वे ट्रंप के रास्ते पर नहीं चले तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।
ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा लंबा टकराव अब एक समझौते के मुहाने पर खड़ा है, जिससे दुनिया भर में राहत की उम्मीद जगी है। लेकिन इस शांति की आहट के साथ ही, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिम और अरब देशों के लिए एक नई चुनौती पेश कर दी है। ट्रंप, इन देशों पर इस बात का ज़ोर दे रहे हैं कि वे इज़राइल के साथ अपने संबंधों को सामान्य करें और 'अब्राहम समझौते' का हिस्सा बनें। रिपोर्टों के मुताबिक, शनिवार को ट्रंप ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन जैसे प्रमुख देशों के नेताओं से फोन पर बातचीत की। इस बातचीत के दौरान, ट्रंप ने एक ऐसा बयान दिया जिसने सभी को चौंका दिया और कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। उन्होंने साफ कहा कि जैसे ही ईरान के साथ टकराव खत्म होगा, अगला बड़ा कदम यह होगा कि अरब और मुस्लिम देश इज़राइल के साथ अपने रिश्ते सामान्य करें और 'अब्राहम समझौते' में शामिल हों।अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इन बातचीत का मुख्य मकसद ईरान के साथ होने वाले संभावित समझौते पर चर्चा करना था। लेकिन इसी दौरान, ट्रंप ने एक नया एजेंडा सामने रख दिया। यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़ायेद जैसे नेताओं ने इस समझौते के प्रति अपना समर्थन जताया। एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि सभी नेताओं ने ट्रंप से कहा, "हम इस सौदे पर आपके साथ हैं; और अगर यह सफल नहीं होता है, तब भी हम आपके साथ हैं।" लेकिन इसी बातचीत में, ट्रंप ने अचानक एक नया विषय छेड़ दिया। उन्होंने नेताओं को बताया कि वह इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को फोन करने वाले हैं, और उन्होंने उम्मीद जताई कि जल्द ही इज़राइली नेता भी इस तरह की बातचीत में शामिल होंगे।
'अब्राहम समझौता' क्या है?
'अब्राहम समझौता' एक ऐतिहासिक पहल है, जिसे अमेरिका की मध्यस्थता से अंजाम दिया गया है। इसका सीधा मकसद अरब देशों और इज़राइल के बीच सालों से चली आ रही दुश्मनी को खत्म करना और उनके बीच कूटनीतिक और व्यापारिक संबंधों को सामान्य बनाना है। यह समझौता COVID-19 महामारी के दौरान हुआ था। शुरुआत में, बहरीन और UAE जैसे देशों ने इसमें हिस्सा लिया, जिससे इज़राइल के साथ उनके औपचारिक कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए। बाद में, मोरक्को और सूडान भी इस समझौते में शामिल हो गए। इस समझौते के पीछे एक बड़ा उद्देश्य यह भी था कि इज़राइल और अरब देशों को एकजुट करके मध्य-पूर्व में ईरान के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला किया जा सके। अब, ट्रंप इसी समूह में ईरान को भी शामिल करने की बात कर रहे हैं।
इज़राइल और ईरान: कट्टर दुश्मन
यह जानना ज़रूरी है कि 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले, ईरान और इज़राइल के बीच संबंध काफी अच्छे थे। लेकिन अयातुल्ला के सत्ता में आने के बाद, "इज़राइल का विनाश" ईरान की विदेश नीति का एक मुख्य नारा बन गया। ईरान ने इस क्षेत्र में अपने विरोधियों, जिनमें इज़राइल भी शामिल है, से निपटने के लिए हमास, हिज़्बुल्लाह और हौथियों जैसे समूहों को मिलाकर एक "प्रतिरोध का ध्रुव" (axis of resistance) बनाया है। दूसरी ओर, इज़राइल ने अमेरिका के साथ मिलकर हाल के हमलों के ज़रिए ईरान के साथ तनाव को और बढ़ा दिया है। इन हालात को देखते हुए, यह संभावना बहुत कम लगती है कि ईरान फिलहाल 'अब्राहम समझौते' में शामिल होगा।
क्या ईरान भी 'अब्राहम समझौते' में शामिल होगा?
इस घटनाक्रम के बाद, ट्रंप ने कहा कि उनके राजदूत, जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ़, आने वाले हफ्तों में इस मामले पर आगे की बातचीत करेंगे। रविवार को, ट्रंप ने 'ट्रुथ सोशल' पर भी इस विषय पर बात की। उन्होंने लिखा, "मैं मध्य पूर्व के सभी देशों को उनके समर्थन और सहयोग के लिए धन्यवाद देता हूँ। अगर वे ऐतिहासिक अब्राहम समझौते में शामिल होते हैं, तो यह सहयोग और भी मज़बूत होगा।" ट्रंप ने तो यहाँ तक कह दिया कि एक दिन, ईरान भी 'अब्राहम समझौते' में शामिल हो सकता है। लेकिन ऐसा होने के लिए, तेहरान को इज़राइल को मान्यता देनी होगी, जो कि ईरान दशकों से करने से इनकार करता रहा है।
क्या सऊदी अरब ट्रंप की बात मानेगा?
रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम, जो ट्रंप के करीबी सहयोगी हैं, ने भी ट्रंप की इस पहल का समर्थन किया है। उन्होंने X (पहले ट्विटर) पर लिखा, "अगर हमारे अरब और मुस्लिम सहयोगी, ईरान के साथ संघर्ष को खत्म करने के उद्देश्य से की गई बातचीत के परिणामस्वरूप अब्राहम समझौते में शामिल होते हैं, तो यह मध्य पूर्व के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण समझौतों में से एक होगा।" ग्राहम ने सऊदी अरब और अन्य देशों को एक सीधी चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा, "अगर आप ट्रंप द्वारा बताए गए रास्ते पर नहीं चलते हैं, तो हमारे भविष्य के संबंधों के लिए इसके गंभीर परिणाम होंगे, और यह शांति प्रस्ताव फिर चर्चा के लिए उपलब्ध नहीं रहेगा। इतिहास इसे एक गंभीर गलती के तौर पर देखेगा।"
हालांकि, सबसे बड़ा सवाल सऊदी अरब पर ही टिका है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पहले भी इज़राइल के साथ संबंध सामान्य बनाने की इच्छा जताई है, लेकिन पिछले एक साल में उनका रुख थोड़ा नरम पड़ा है।
मध्य पूर्व को बदलना होगा: ग्राहम
ट्रंप के करीबी सहयोगी लिंडसे ग्राहम ने सऊदी अरब और अन्य देशों से अपील करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि वे एक नए मध्य पूर्व के भविष्य के लिए ज़रूरी साहस दिखाएँ। उन्होंने कहा, "जैसा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने सुझाव दिया है, अगर आप अब्राहम समझौते में शामिल होते हैं, तो आप अरब-इज़राइली संघर्ष को हमेशा के लिए खत्म कर सकते हैं।" ग्राहम का मानना है कि यह एक ऐसा मौका है जिसे हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। यह मध्य पूर्व के लिए एक नए युग की शुरुआत कर सकता है, जहां शांति और सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।
यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रंप की यह नई पहल कितना रंग लाती है। ईरान के साथ शांति की उम्मीद और अरब देशों पर इज़राइल के साथ संबंध सामान्य करने का दबाव, मध्य पूर्व की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है। लेकिन ईरान और इज़राइल के बीच गहरी खाई को पाटना आसान नहीं होगा। सऊदी अरब जैसे देशों का रुख इस पूरी प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाएगा।