भारत में कच्चे तेल के आयात पर संकट: ईंधन और थोक महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर

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होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जारी संघर्ष के कारण भारत में कच्चे तेल का आयात प्रभावित हुआ है। इससे पेट्रोल, डीज़ल और एलपीजी की कीमतें बढ़ रही हैं। थोक बाज़ार में महंगाई 42 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है। यह स्थिति आम आदमी के बजट पर भारी पड़ रही है।

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मध्य पूर्व में युद्ध का भारत पर गहराता असर: आम आदमी की जेब पर महंगाई की मार

मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के कारण होर्मुज़ जलडमरूमध्य के अवरुद्ध होने से भारत की अर्थव्यवस्था पर गंभीर संकट मंडराने लगा है। भारत अपने कच्चे तेल का 90% आयात करता है, जिसका अधिकांश हिस्सा अरब देशों से आता है। इस रुकावट के चलते न केवल कुकिंग गैस, बल्कि पेट्रोल और डीज़ल की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है, जिससे ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसका सीधा असर थोक बाज़ार में महंगाई पर पड़ा है, जिसने पिछले 42 महीनों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में 88% की वृद्धि के कारण भारत में गैस, पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ी हैं, जिससे आम आदमी के घर का बजट बिगड़ गया है और बढ़ती महंगाई आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाली साबित हो सकती है।
थोक बाज़ार में महंगाई का 42 महीने का रिकॉर्ड टूटा

होर्मुज़ जलडमरूमध्य के अवरुद्ध होने का सीधा असर वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है, जिसमें 88% की भारी वृद्धि देखी गई है। इस बढ़ोतरी का खामियाजा भारत को भुगतना पड़ रहा है, जहाँ गैस, पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। जहाँ एक ओर खुदरा बाज़ार में कीमतें अभी स्थिर दिख रही हैं, वहीं थोक बाज़ार में महंगाई ने पिछले 42 महीनों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। यह स्थिति आम आदमी के घर और रसोई के बजट को बुरी तरह बिगाड़ रही है। अगर यही हालात बने रहे, तो बढ़ती महंगाई भारतीय जनता के लिए आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाली साबित हो सकती है।

ईंधन की बढ़ती कीमतें हर चीज़ को महंगा कर देंगी

बाज़ार विशेषज्ञों का मानना है कि पेट्रोल और डीज़ल के महंगे होने से परिवहन और माल ढुलाई की लागत सीधे तौर पर बढ़ जाएगी। इसका मतलब है कि कृषि संबंधी कच्चे माल और उत्पादों की कीमतें बढ़ना तय है। इसके अलावा, डीज़ल की बढ़ती कीमतों से कारखानों की परिचालन लागत भी बढ़ जाएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत में इस्तेमाल होने वाले डीज़ल का लगभग 40% हिस्सा ट्रक, बस, कृषि पंप, जनरेटर और औद्योगिक इकाइयों द्वारा उपयोग किया जाता है। नतीजतन, डीज़ल की कीमतों में वृद्धि से लगभग हर वस्तु—जिसमें सब्ज़ियाँ, दूध, फल, पैकेटबंद भोजन, सीमेंट और स्टील शामिल हैं—महंगी हो जाएगी।

उपभोक्ता और थोक मूल्य सूचकांकों में वृद्धि की संभावना

बाज़ार विशेषज्ञों का अनुमान है कि पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में वृद्धि से देश की समग्र महंगाई दर में लगभग 20 आधार अंकों (0.20%) की वृद्धि हो सकती है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI)—जो भोजन, पानी, आवास, परिवहन, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसी दैनिक ज़रूरतों की कीमतें मापने का एक पैमाना है—में वृद्धि होने की संभावना है। CPI में वृद्धि से परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। इसके अलावा, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में भी वृद्धि होने की उम्मीद है। यह सूचकांक थोक बाज़ार के भीतर कीमतों को मापता है और इसमें ईंधन, कच्चा माल, धातुएँ और निर्मित वस्तुएँ जैसी चीज़ें शामिल होती हैं। जब थोक में खरीदी गई चीज़ें महँगी हो जाती हैं, तो कंपनियाँ हमेशा इन बढ़ी हुई कीमतों का बोझ अपने ग्राहकों पर डाल देती हैं। नतीजतन, किसी भी स्थिति में, यह बोझ आखिरकार आम आदमी पर ही पड़ता है।

अप्रैल में खुदरा और थोक महँगाई बढ़ी

मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष का असर भारत की खुदरा महँगाई पर भी पड़ा है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) से मापी जाने वाली खुदरा महँगाई मार्च के 3.40% से बढ़कर अप्रैल 2026 में 3.48% हो गई। वहीं, थोक मूल्य सूचकांक (WPI) से मापी जाने वाली थोक महँगाई मार्च के 3.88% से बढ़कर अप्रैल में 8.3% हो गई। महँगाई का यह स्तर पिछले 42 महीनों में सबसे ऊँचा है। इस आँकड़े में सबसे बड़ी बढ़ोतरी ईंधन और बिजली क्षेत्र में देखी गई, जो अकेले अप्रैल में 1.05% बढ़कर 24.71% हो गई। इसकी मुख्य वजह कच्चे तेल की कीमतों में हुई 88% की बढ़ोतरी थी। नतीजतन, पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी थोक महँगाई के कुल स्तर को ऊपर धकेल रही है।

अरहर दाल की कीमतों में सबसे तेज़ बढ़ोतरी

व्यापारियों के अनुसार, पिछले महीने अरहर दाल (पीजन दाल) की कीमतों में सबसे तेज़ बढ़ोतरी देखी गई है। थोक बाज़ार में, अरहर करीब 12% महँगी हो गई है, और अब इसकी कीमत ₹9,000 से ₹11,800 प्रति क्विंटल के बीच है। उड़द दाल (काली उड़द) की कीमतों में भी ₹500 से ₹800 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, मसूर दाल (लाल मसूर) की कीमतों में मार्च से अब तक करीब 10% की बढ़ोतरी हुई है।

थोक महँगाई 9% तक पहुँच सकती है

अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि अगर मध्य-पूर्व में संकट और गहराता है, तो मई और जून में घरेलू थोक महँगाई बढ़कर 9% तक पहुँच सकती है। वैश्विक महँगाई में हो रही बढ़ोतरी का असर जल्द ही घरेलू ईंधन, विनिर्माण और परिवहन लागतों पर भी दिखने की उम्मीद है। खुदरा महँगाई में भी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, क्योंकि ईंधन, भोजन और परिवहन की बढ़ी हुई लागतें आखिरकार नीचे तक पहुँचेंगी और खुदरा कीमतों को प्रभावित करेंगी।

संकट का मूल कारण: होर्मुज़ जलडमरूमध्य का अवरुद्ध होना

भारत अपने कच्चे तेल की ज़रूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, और इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा मध्य पूर्व से आता है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और खुले समुद्र से जोड़ता है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग लेन में से एक है, खासकर तेल टैंकरों के लिए। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव के कारण इस जलडमरूमध्य का अवरुद्ध होना, तेल की आपूर्ति श्रृंखला में एक बड़ी बाधा उत्पन्न करता है। जब यह मार्ग अवरुद्ध होता है, तो तेल टैंकरों को वैकल्पिक, लंबे और अधिक महंगे मार्गों का उपयोग करना पड़ता है, या वे पूरी तरह से रुक जाते हैं। इससे वैश्विक तेल की आपूर्ति कम हो जाती है और कीमतें बढ़ जाती हैं।

ईंधन की कीमतों का सीधा असर: परिवहन और उत्पादन लागत में वृद्धि

पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें सीधे तौर पर परिवहन लागत को प्रभावित करती हैं। जब ईंधन महंगा होता है, तो ट्रकों, बसों और अन्य वाहनों को चलाने की लागत बढ़ जाती है। इसका मतलब है कि माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने में अधिक खर्च आता है। यह बढ़ी हुई लागत अंततः उपभोक्ताओं पर डाली जाती है, जिससे हर तरह के सामान महंगे हो जाते हैं। कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। ट्रैक्टरों, सिंचाई पंपों और अन्य कृषि उपकरणों को चलाने के लिए डीज़ल की आवश्यकता होती है। डीज़ल की बढ़ती कीमतें किसानों की उत्पादन लागत को बढ़ाती हैं, जिससे अनाज, सब्जियों और फलों जैसी खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं।

औद्योगिक उत्पादन पर भी मार

भारत में डीज़ल का एक बड़ा हिस्सा औद्योगिक इकाइयों द्वारा भी उपयोग किया जाता है। जनरेटर, मशीनरी और अन्य औद्योगिक उपकरणों को चलाने के लिए डीज़ल की आवश्यकता होती है। डीज़ल की कीमतों में वृद्धि से कारखानों की परिचालन लागत बढ़ जाती है, जिससे उनके उत्पादों की कीमतें भी बढ़ जाती हैं। सीमेंट, स्टील और अन्य निर्माण सामग्री जैसी चीज़ें भी डीज़ल से चलने वाले परिवहन पर निर्भर करती हैं। इसलिए, डीज़ल की बढ़ती कीमतों का असर निर्माण क्षेत्र पर भी पड़ता है, जिससे घर बनाना और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को पूरा करना अधिक महंगा हो जाता है।

महंगाई के दोहरे मार: उपभोक्ता और थोक मूल्य सूचकांक

महंगाई को मापने के लिए दो मुख्य सूचकांकों का उपयोग किया जाता है: उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) और थोक मूल्य सूचकांक (WPI)। CPI आम उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में बदलाव को मापता है, जैसे कि भोजन, कपड़े, आवास, परिवहन और स्वास्थ्य सेवा। WPI थोक बाज़ार में वस्तुओं की कीमतों में बदलाव को मापता है, जिसमें ईंधन, कच्चा माल, धातुएँ और निर्मित वस्तुएँ शामिल होती हैं। जब WPI बढ़ता है, तो कंपनियाँ अक्सर बढ़ी हुई लागतों को उपभोक्ताओं पर डाल देती हैं, जिससे CPI भी बढ़ जाता है। इस तरह, आम आदमी को महंगाई की दोहरी मार झेलनी पड़ती है।

दालों की कीमतों में उछाल: आम आदमी की थाली पर असर

ईंधन की बढ़ती कीमतों के अलावा, कुछ आवश्यक खाद्य पदार्थों की कीमतों में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। अरहर दाल, उड़द दाल और मसूर दाल जैसी दालों की कीमतों में पिछले महीने काफी बढ़ोतरी हुई है। दालें भारतीय आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, और इनकी बढ़ती कीमतें आम आदमी की थाली पर सीधा असर डालती हैं। प्रोटीन का एक सस्ता स्रोत होने के नाते, दालों की बढ़ती कीमतें परिवारों के लिए भोजन का खर्च बढ़ा देती हैं।

भविष्य की चिंता: महंगाई का और बढ़ने का अनुमान

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व में संकट जारी रहता है, तो आने वाले महीनों में घरेलू थोक महँगाई 9% तक पहुँच सकती है। वैश्विक महँगाई का असर जल्द ही घरेलू ईंधन, विनिर्माण और परिवहन लागतों पर भी दिखेगा। खुदरा महँगाई में भी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, क्योंकि ईंधन, भोजन और परिवहन की बढ़ी हुई लागतें अंततः खुदरा कीमतों को प्रभावित करेंगी। यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करती है, और सरकार को महंगाई को नियंत्रित करने और आम आदमी को राहत देने के लिए प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता होगी।