विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध जारी रखा

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Navbharat Times
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी दलों का विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है। विपक्ष लगातार चुनाव आयोग पर सवाल खड़े कर रहा है। इस बीच, रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने कहा है कि हमें संवैधानिक संस्थाओं को निशाना नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी नागरिक को उनके वोट देने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने नई दिल्ली में एक बातचीत के दौरान ये बातें कीं। उन्होंने कहा कि देश में जो लोग अवैध रूप से रह रहे हैं, उन्हें वोटर बनने के मुद्दे पर गंभीरता से सोचना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया, "क्या अनधिकृत रूप से रह रहे लोगों का वोटर बनना देश की व्यवस्था के लिए उचित है? क्या इससे देश में अव्यवस्था नहीं फैलेगी?" उन्होंने जम्मू-कश्मीर में कई बांग्लादेशी नागरिकों के अवैध प्रवास के मुद्दे पर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने पूछा, "ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या उनके पास वोटर आईडी है? क्या वे सरकारी योजनाओं का लाभ ले रहे हैं?" इन सभी पहलुओं की जांच की आवश्यकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि देश में संवैधानिक संस्थाओं को लक्षित नहीं करना चाहिए। सीजेपी के सदस्यों के बारे में बोलते हुए उन्होंने यह स्पष्ट किया कि "मैं समझता हूं कि इस देश में बोलने की आजादी है, इसलिए लोग बोलते हैं। मुझे नहीं लगता कि किसी भी देश में इतनी बोलने की आजादी है।" सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि नोटिस जारी करना एक प्रक्रिया है। जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनके पास अपील करने का विकल्प भी है।"

पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल जजों की शिकायतों पर रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए ट्रिब्यूनल के सभी जजों को अपनी शिकायतें सुप्रीम कोर्ट के सामने रखनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि वे समस्याओं के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट से मार्गदर्शन लें। "यह कोई तकनीकी दिक्कत हो सकती है। इसके लिए ट्रिब्यूनल जज सुप्रीम कोर्ट से अनुमति ले सकते हैं और इंडिया के चुनाव आयोग के साथ भी बातचीत कर सकते हैं।"

उन्होंने बताया कि "यह जरूरी नहीं है कि जज तकनीकी विशेषज्ञ हों, क्योंकि उनका काम अलग होता है। फॉर्मेटिंग, फॉर्म भरना और तकनीकी बारीकियों को समझना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।" जजों को अपनी समस्याओं के बारे में सुप्रीम कोर्ट को बताना चाहिए।

रिटायर्ड जस्टिस लोकपाल सिंह ने यह भी उल्लेख किया कि "वोट देने का अधिकार कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है। यह एक कानूनी अधिकार है।" उन्होंने कहा कि "हम कहते हैं कि यह संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह मौलिक अधिकार नहीं है।" जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं, उनका अधिकार पुनः प्राप्त करने के लिए भारत के चुनाव आयोग में अर्जी देनी चाहिए।

इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने कहा कि "जिम्मेदारी उस अथॉरिटी की होगी, जो इस पर नजर रख रही है।" उन्होंने कहा, "इसके लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार है।" वकील त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि "यह सुनिश्चित करना पूरी तरह से चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वोटर्स अपने अधिकारों से वंचित न रहें और कमियों को दूर किया जाए।" उन्होंने चिंता जताई कि "चुनाव आयोग की तैयारियों को देखते हुए ये कमियां दूर हो पाएंगी। ऐसा लगता है कि लोग वोट देने के अपने अधिकार से वंचित होते रहेंगे और इसका कोई समाधान दिखाई नहीं दे रहा है।"

वकील त्रिपाठी के अनुसार, "ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग की छवि पर असर पड़ना तय है। गलती चुनाव आयोग की है।" जब ट्रिब्यूनल के जज यह लिख रहे हैं कि "वे पोर्टल का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं, नोटिस नहीं भेजे जा सकते, वर्चुअल सुनवाई नहीं हो सकती और फिजिकली जमा किए गए दस्तावेज अपलोड नहीं हो रहे हैं," तो निश्चित रूप से चुनाव आयोग पर सवाल उठेंगे। वकील ने कहा, "चुनाव आयोग कैसे कह सकता है कि लोग गलत तरीके से सवाल उठा रहे हैं?"

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि "सुप्रीम कोर्ट ने जून में अपने आदेश में कहा था कि हाईकोर्ट एक अलग पोर्टल बनाएगा। इसी के जरिए 19 ट्रिब्यूनल बनाए गए और सुनवाई शुरू हुई।" लेकिन अब दिख रही समस्या गंभीर है। "अगर पोर्टल ठीक से काम नहीं करता है, तो इसका मतलब है कि अपीलों की सुनवाई लगभग रुक जाएगी।"

वकील त्रिपाठी ने बताया कि "पोर्टल में कई प्रकार की दिक्कतें सामने आ रही हैं। दस्तावेज अपलोड करने में परेशानी हो रही है या वे अपलोड ही नहीं हो रहे हैं। ट्रिब्यूनल की ओर से समन और नोटिस भेजने जैसी प्रक्रियाएं भी पूरी नहीं हो पा रही हैं।" इसके अलावा कई अन्य तकनीकी समस्याएं भी हैं, जिनके चलते काम ठप हो गया है।

सभी मामलों में, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और संतोषजनक निष्पादन की आवश्यकता है। बिना किसी ठोस समाधान के, चुनाव आयोग को अपने इतिहास में सवालों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है।

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