सुप्रीम कोर्ट का ट्रंप प्रशासन को झटका: मेल बैलेट पर नए नियम लागू करने से रोका

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वॉशिंगटन, 15 सितंबर (आईएएनएस)। अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन को बड़ा झटका देते हुए नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनावों के लिए मेल बैलेट (डाक मतपत्र) पर नए और कड़े नियम लागू करने से रोक दिया है। कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसने अमेरिकी डाक सेवा (USPS) के इन नए नियमों पर प्रतिबंध लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की उस आपातकालीन अपील को खारिज कर दिया, जिसमें इस प्रतिबंध को हटाने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि सरकार यह साबित नहीं कर पाई कि वह इस मामले में निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने में सफल होगी। इसलिए, फिलहाल यह तय हो गया है कि तीन नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनावों में इन नए नियमों का इस्तेमाल नहीं होगा।

यह फैसला अमेरिकी चुनावों में डाक मतपत्रों के इस्तेमाल को लेकर चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। ट्रंप प्रशासन ने अगस्त में ये नियम लागू किए थे, जिनका मकसद चुनाव प्रक्रिया की सुरक्षा और विश्वसनीयता बढ़ाना था। इन नियमों के तहत, राज्यों को मतपत्रों के लिफाफों का एक नया डिजाइन तैयार करना पड़ता। इस डिजाइन में चुनावी डाक का लोगो, मशीन से पढ़ा जा सकने वाला फीचर और हर मतदाता के लिए एक विशेष बारकोड शामिल करना अनिवार्य था। इसके अलावा, राज्यों को इन डिजाइनों को संघीय मंजूरी के लिए भेजना पड़ता और मतदाताओं के नाम, पते और बारकोड की जानकारी एक नए डाक सेवा पोर्टल पर अपलोड करनी होती। जो डाक सामग्री इन नियमों का पालन नहीं करती, उसे स्वीकार नहीं किया जाता और वापस राज्य के चुनाव अधिकारियों को भेज दिया जाता।
चुनाव अधिकारियों ने इस फैसले पर चिंता जताई थी। उनका कहना था कि मतदान शुरू होने के इतने करीब इस तरह के बड़े बदलावों को लागू करना संभव नहीं है। नॉर्थ कैरोलिना और विस्कॉन्सिन जैसे राज्य पहले ही मतपत्र भेजना शुरू कर चुके थे। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, एक दर्जन से ज्यादा अन्य राज्य भी सप्ताह के अंत तक मतपत्र भेजने की तैयारी कर रहे थे। केवल नॉर्थ कैरोलिना में ही लगभग 3 लाख अनुपस्थित मतदाता बैलेट पहले ही भेजे जा चुके थे। नॉर्थ कैरोलिना के अटॉर्नी जनरल जेफ जैक्सन ने इस स्थिति पर कहा, "मतदान शुरू हो चुका है। चुनाव के बीच में नियम नहीं बदले जा सकते।"

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि डाक सेवा भविष्य के चुनावों में ऐसे नियम लागू नहीं कर सकती। यह फैसला केवल तीन नवंबर के मिडटर्म चुनावों के लिए है, जिनमें यह तय होगा कि प्रतिनिधि सभा और सीनेट पर किसका नियंत्रण रहेगा। वॉल स्ट्रीट जर्नल और वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार, 2024 में लगभग एक-तिहाई अमेरिकी मतदाताओं ने डाक के जरिए मतदान किया था। यह दिखाता है कि डाक मतपत्र अमेरिकी चुनावों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि ये नए नियम संविधान के अनुरूप हैं और इनका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को और सुरक्षित बनाना है। वहीं, डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाले राज्यों और मतदान अधिकारों से जुड़ी संस्थाओं का कहना था कि डाक सेवा चुनावों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। उनका तर्क था कि अमेरिकी संविधान के अनुसार, चुनावों का संचालन और नियमन मुख्य रूप से राज्यों की जिम्मेदारी होती है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों, जस्टिस सैमुअल एलिटो और क्लेरेंस थॉमस ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई। जस्टिस एलिटो का मानना था कि डाक सेवा के पास 'डाक वितरण को नियंत्रित करने की व्यापक शक्ति' है। उनका मानना था कि नियमों को चुनौती देने वाले यह साबित नहीं कर पाए कि एजेंसी ने अपने अधिकारों की सीमा को स्पष्ट रूप से पार किया है।

दूसरी ओर, जस्टिस ब्रेट कैवनॉ, जो बहुमत के फैसले के साथ थे, ने कहा कि यह संभव है कि डाक सेवा के पास ऐसे नियम बनाने का अधिकार हो। उन्होंने लिखा, "कम से कम इतनी संभावना जरूर है कि अंतिम नियम डाक सेवा को कानून की ओर से दिए गए अधिकारों के दायरे में आते हों।" हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि इस साल इन नियमों को लागू करना 'मनमाना और अनुचित' होता, क्योंकि राज्य और स्थानीय अधिकारियों के पास चुनाव से पहले इन्हें सही तरीके से लागू करने के लिए पर्याप्त समय नहीं था।

दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों से जुड़े चुनाव अधिकारियों ने कोर्ट से 2026 के चुनावों के लिए इन नियमों को रोकने की मांग की थी। यूटा और मिशिगन के रिपब्लिकन अधिकारियों ने भी कोर्ट के फैसले का स्वागत किया और कहा कि इससे स्थिति स्पष्ट हो गई है।

यह मामला अमेरिकी राजनीति में डाक मतपत्रों के महत्व और उनके नियमन को लेकर चल रही गहरी खाई को दर्शाता है। जहां एक ओर ट्रंप प्रशासन सुरक्षा को लेकर चिंतित था, वहीं दूसरी ओर डेमोक्रेट्स और अन्य समूह यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि मतदाताओं को मतदान करने में कोई बाधा न आए। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला फिलहाल इस विवाद को कुछ समय के लिए शांत कर सकता है, लेकिन भविष्य में डाक मतपत्रों के नियमन को लेकर बहस जारी रहने की संभावना है।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि मेल बैलेट या डाक मतपत्र क्या होते हैं। ये ऐसे मतपत्र होते हैं जिन्हें मतदाता अपने घर से भरकर डाक के माध्यम से चुनाव अधिकारियों को भेजते हैं। यह उन लोगों के लिए एक सुविधाजनक तरीका है जो मतदान के दिन मतदान केंद्र पर नहीं जा सकते या जो घर से ही मतदान करना पसंद करते हैं। अमेरिका में, डाक द्वारा मतदान की सुविधा अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नियमों के तहत दी जाती है। कुछ राज्य स्वचालित रूप से सभी पंजीकृत मतदाताओं को डाक मतपत्र भेजते हैं, जबकि अन्य राज्यों में मतदाताओं को इसके लिए आवेदन करना पड़ता है।

ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित नए नियमों का उद्देश्य डाक मतपत्रों की सुरक्षा को बढ़ाना था। उनका मानना था कि नए डिजाइन और बारकोड जैसी चीजें धोखाधड़ी को रोकने में मदद करेंगी। हालांकि, विरोधियों का तर्क था कि ये नियम अनावश्यक रूप से जटिल थे और इससे डाक मतपत्रों को मतदाताओं तक पहुंचने में देरी हो सकती थी, जिससे कुछ लोगों का वोट रद्द भी हो सकता था।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला, जिसमें उसने सरकार की आपातकालीन अपील को खारिज कर दिया, यह दर्शाता है कि अदालतें चुनाव प्रक्रिया में अचानक और बड़े बदलावों को लेकर सतर्क रहती हैं, खासकर जब मतदान की तारीखें नजदीक हों। कोर्ट ने यह भी माना कि सरकार यह साबित करने में विफल रही कि वह निचली अदालत के फैसले को पलटने में सफल होगी। यह एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत है कि आपातकालीन राहत तभी दी जाती है जब यह स्पष्ट हो कि याचिकाकर्ता के जीतने की मजबूत संभावना है।

इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि अमेरिकी संविधान के तहत चुनाव कराने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्यों की है। डाक सेवा एक संघीय एजेंसी है, लेकिन वह राज्यों के चुनाव कराने के तरीके में सीधे तौर पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती, खासकर ऐसे नियमों के माध्यम से जो राज्यों के लिए अतिरिक्त बोझ पैदा करें या उनकी स्वायत्तता को कम करें।

संक्षेप में, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने नवंबर के मिडटर्म चुनावों में डाक मतपत्रों पर ट्रंप प्रशासन के नए नियमों को लागू होने से रोक दिया है। यह फैसला चुनाव अधिकारियों, मतदाताओं और राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ी राहत है, क्योंकि इससे मतदान प्रक्रिया में अंतिम समय में होने वाले संभावित व्यवधानों से बचा जा सकेगा। हालांकि, भविष्य में डाक मतपत्रों के नियमन को लेकर बहस जारी रहेगी।

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