गगनचुंबी इमारतों की ‘नींव’ बनाने वाले आज भी बेघर

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Navbharat Times

Pravesh.Singh

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n नोएडा : 17 अप्रैल को देश का सबसे आधुनिक और शो-विंडो कहा जाने वाला शहर नोएडा अपनी स्थापना के 50 साल पूरे करने जा रहा है। आधी सदी का यह सफर शानदार रहा है, यहां चमचमाते कॉरपोरेट दफ्तर हैं, आसमान छूती हाईराइज सोसायटियां हैं और चौड़ी सड़कों का जाल है। लेकिन इस सुनहरी तस्वीर का स्याह पहलू यह है कि इस शहर को अपने खून-पसीने से सींचने वाला मजदूर आज भी यहां लावारिस और बेघर है। जिस श्रमिक के भरोसे 50 साल पहले एक औद्योगिक केंद्र की परिकल्पना की गई थी, उसे ही नोएडा अथॉरिटी की फाइलों में जगह नहीं मिली।

नोएडा एंटरप्रेन्योर असोसिएशन (NEA) के आंकड़ों के मुताबिक नोएडा की विभिन्न इंडस्ट्रीज में करीब 12 लाख मजदूर काम करते हैं। विडंबना देखिए कि 12 लाख हाथों ने इस शहर को खड़ा किया, लेकिन अथॉरिटी के पास इनमें से 50 हजार मजदूरों के लिए भी स्थाई आवास की व्यवस्था नहीं है। अथॉरिटी की प्लानिंग में सबसे बड़ी चूक यह रही कि यहां इंडस्ट्रियल सेक्टर तो बसे पर श्रमिक कॉलोनियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।

रिकॉर्ड बताते हैं कि 25 सालों में श्रमिकों के लिए एक भी नई आवास योजना नहीं लाई गई है। जो गिनी-चुनी तीन-चार श्रमिक कॉलोनियां मौजूद हैं, वे 30 साल पुरानी प्लानिंग का हिस्सा हैं। जमीन के आसमान छूते दामों के बीच एक मजदूर के लिए यहां घर खरीदना तो दूर, सम्मानजनक तरीके से किराए पर रहना भी मुहाल है। मजदूर आक्रोश की सबसे बड़ी जड़ भी यही है मजदूर नोएडा में काम तो कर रहा है, लेकिन महंगाई और किराए की मार उसे रोजी-रोटी चलाने नहीं दे रही।

गांवों और तंग गलियों की हकीकत यह है कि एक कमरे में 8 से 10 मजदूर रहने को मजबूर हैं। 5 से 7 हजार रुपये के एक कमरे में रहने वाले इन मजदूरों की जिंदगी केवल काम और नींद के बीच सिमट गई है। घर न होने से 70% मजदूर फैमिली साथ नहीं रख पाते।